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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Wed Sep 17, 2008 10:50 am |
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अध्याय 131. मान
1301
आलिंगन करना नहीं, ठहरो करके मान ।
देखें हम उनको ज़रा, सहते ताप अमान ॥
1302
ज्यों भोजन में नमक हो, प्रणय-कलह त्यों जान ।
ज़रा बढ़ाओ तो उसे, ज्यादा नमक समान ॥
1303
अगर मना कर ना मिलो, जो करती है मान ।
तो वह, दुखिया को यथा, देना दुख महान ॥
1304
उसे मनाया यदि नहीं, जो कर बैठी मान ।
सूखी वल्ली का यथा, मूल काटना जान ॥
1305
कुसुम-नेत्रयुत प्रियतमा, रूठे अगर यथेष्ट ।
शोभा देती सुजन को, जिनके गुण हैं श्रेष्ठ ॥
1306
प्रणय-कलह यदि नहिं हुआ, और न थोड़ा मान ।
कच्चा या अति पक्व सम, काम-भोग-फल जान ॥
1307
‘क्या न बढ़ेगा मिलन-सुख’, यों है शंका-भाव ।
प्रणय-कलह में इसलिये, रहता दुखद स्वभाव ॥
1308
‘पीड़ित है’ यों समझती, प्रिया नहीं रह जाय ।
तो सहने से वेदना, क्या ही फल हो जाय ॥
1309
छाया के नीचे रहा, तो है सुमधुर नीर ।
प्रिय से हो तो मधुर है, प्रणय कलह-तासीर ॥
1310
सूख गयी जो मान से, और रही बिन छोह ।
मिलनेच्छा उससे रहा, मेरे दिल का मोह ॥
अध्याय 132. मान की सूक्ष्मता
1311
सभी स्त्रियाँ सम भाव से, करतीं दृग से भोग ।
रे विट् तेरे वक्ष से, मैं न करूँ संयोग ॥
1312
हम बैठी थीं मान कर, छींक गये तब नाथ ।
यों विचार ‘चिर जीव’ कह, हम कर लेंगी बात ॥
1313
धरूँ डाल का फूल तो, यों होती नाराज़ ।
दर्शनार्थ औ’ नारि से, करते हैं यह साज ॥
1314
‘सब से बढ़’, मैंने कहा, ‘हम करते हैं प्यार’ ।
‘किस किस से’ कहती हुई, लगी रुठने यार ॥
1315
यों कहने पर- हम नहीं, ‘बिछुड़ेंगे इस जन्म’ ।
भर लायी दृग, सोच यह, क्या हो अगले जन्म ॥
1316
‘स्मरण किया’ मैंने कहा, तो क्यों बैठे भूल ।
यों कह मिले बिना रही, पकड़ मान का तूल ॥
1317
छींका तो, कह शुभ वचन, तभी बदल दी बात ।
‘कौन स्मरण कर छींक दी’, कह रोयी सविषाद ॥
1318
छींक दबाता मैं रहा, रोयी कह यह बैन ।
अपनी जो करती स्मरण, उसे छिपाते हैं न ॥
1319
अगर मनाऊँ तो सही, यों कह होती रुष्ट ।
करते होंगे अन्य को, इसी तरह से तुष्ट ॥
1320
देखूँ यदि मैं मुग्ध हो, यों कह करती रार ।
देख रहे हैं आप सब, दिल में किसे विचार ॥
अध्याय 133. मान का आनन्द
1321
यद्यपि उनकी भूल नहिं, उनका प्रणय-विधान ।
प्रेरित करता है मुझे, करने के हित मान ॥
1322
मान जनित लघु दुःख से, यद्यपि प्रिय का प्रेम ।
मुरझा जाता है ज़रा, फिर भी पाता क्षेम ॥
1323
मिट्टी-पानी मिलन सम, जिस प्रिय का संपर्क ।
उनसे होते कलह से, बढ़ कर है क्या स्वर्ग ॥
1324
मिलन साध्य कर, बिछुड़ने, देता नहिं जो मान ।
उससे आविर्भूत हो, हृत्स्फोटक सामान ॥
1325
यद्यपि प्रिय निर्दोष है, मृदुल प्रिया का स्कंध ।
छूट रहे जब मिलन से, तब है इक आनन्द ॥
1326
खाने से, खाया हुआ, पचना सुखकर जान ।
काम-भोग हित मिलन से, अधिक सुखद है मान ॥
1327
प्रणय-कलह में जो विजित, उसे रहा जय योग ।
वह तो जाना जायगा, जब होगा संयोग ॥
1328
स्वेद-जनक सुललाट पर, मिलन जन्य आनन्द ।
प्रणय-कलह कर क्या मिले, फिर वह हमें अमन्द ॥
1329
रत्नाभरण सजी प्रिया, करे और भी मान ।
करें मनौती हम यथा, बढ़े रात्रि का मान ॥
1330
रहा काम का मधुर रस, प्रणय-कलह अवगाह ।
फिर उसका है मधुर रस, मधुर मिलन सोत्साह ॥
P.S. Dear readers,
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Warm Regards,
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