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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Wed Sep 17, 2008 10:28 am |
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अध्याय 128. इंगित से बोध
1271
रखने पर भी कर छिपा, मर्यादा को पार ।
हैं तेरे ही नेत्र कुछ, कहने का तैयार ॥
1272
छवि भरती है आँख भर, बाँस सदृश हैं स्कंध ।
मुग्धा में है मूढ़ता, नारी-सुलभ अमंद ॥
1273
अन्दर से ज्यों दीखता, माला-मणि में सूत ।
बाला छवि में दीखता, कुछ संकेत प्रसूत ॥
1274
बद कली में गंध ज्यों, रहती है हो बंद ।
त्यों इंगित इक बंद है, मुग्धा-स्मिति में मंद ॥
1275
बाला ने, चूड़ी-सजी, मुझसे किया दुराव ।
दुःख निवारक इक दवा, रखता है वह हाव ॥
1276
दे कर अतिशय मिलन सुख, देना दुःख निवार ।
स्मारक भावी विरह का, औ’ निष्प्रिय व्यवहार ॥
1277
नायक शीतल घाट का, बिछुड़ जाय यह बात ।
मेरे पहले हो गयी, इन वलयों को ज्ञात ॥
1278
कल ही गये वियुक्त कर, मेरे प्यारे नाथ ।
पीलापन तन को लिये, बीत गये दिन सात ॥
1279
वलय देख फिर स्कंध भी, तथा देख निज पाँव ।
यों उसने इंगित किया, साथ गमन का भाव ॥
1280
काम-रोग को प्रगट कर, नयनों से कर सैन ।
याचन करना तो रहा, स्त्रीत्व-लब्ध गुण स्त्रैण ॥
अध्याय 129. मिलन-उत्कंठा
1281
मुद होना स्मृति मात्र से, दर्शन से उल्लास ।
ये गुण नहीं शराब में, रहे काम के पास ॥
1282
यदि आवेगा काम तो, बढ़ कर ताड़ समान ।
तिल भर भी नहिं चाहिये, करना प्रिय से मान ॥
1283
यद्यपि मनमानी करें, बिन आदर की सैन ।
प्रियतम को देखे बिना, नयनों को नहिं चैन ॥
1284
गयी रूठने री सखी, करके मान-विचार ।
मेरा दिल वह भूल कर, मिलने को तैयार ॥
1285
कूँची को नहिं देखते, यथा आंजते अक्ष ।
उनकी भूल न देखती, जब हैं नाथ समक्ष ॥
1286
जब प्रिय को मैं देखती, नहीं देखती दोष ।
ना देखूँ तो देखती, कुछ न छोड़ कर दोष ॥
1287
कूदे यथा प्रवाह में, बाढ़ बहाती जान ।
निष्फलता को जान कर, क्या हो करते मान ॥
1288
निन्दाप्रद दुख क्यों न दे, मद्यप को ज्यों पान ।
त्यों है, वंचक रे, हमें, तेरी छाती जान ॥
1289
मृदुतर हो कर सुमन से, जो रहता है काम ।
बिरले जन को प्राप्त है, उसका शुभ परिणाम ॥
1290
उत्कंठित मुझसे अधिक, रही मिलन हित बाल ।
मान दिखा कर नयन से, गले लगी तत्काल ॥
अध्याय 130. हृदय से रूठना
1291
उनका दिल उनका रहा, देते उनका साथ ।
उसे देख भी, हृदय तू, क्यों नहिं मेरे साथ ॥
1292
प्रिय को निर्मम देख भी, ‘वे नहिं हो नाराज़’ ।
यों विचार कर तू चला, रे दिल, उनके पास ॥
1293
रे दिल, जो हैं कष्ट में, उनके हैं नहिं इष्ट ।
सो क्या उनका पिछलगा, बना यथा निज इष्ट ॥
1294
रे दिल तू तो रूठ कर, बाद न ले सुख-स्वाद ।
तुझसे कौन करे अभी, तत्सम्बन्धी बात ॥
1295
न मिल तो भय, या मिले, तो भेतव्य वियोग ।
मेरा दिल है चिर दुखी, वियोग या संयोग ॥
1296
विरह दशा में अलग रह, जब करती थी याद ।
मानों मेरा दिल मुझे, खाता था रह साथ ॥
1297
मूढ हृदय बहुमति रहित, नहीं भूलता नाथ ।
मैं भूली निज लाज भी, पड़ कर इसके साथ ॥
1298
नाथ-उपेक्षा निंद्य है, यों करके सुविचार ।
करता उनका गुण-स्मरण, यह दिल जीवन-प्यार ॥
1299
संकट होने पर मदद, कौन करेगा हाय ।
जब कि निजी दिल आपना, करता नहीं सहाय ॥
1300
बन्धु बनें नहिं अन्य जन, है यह सहज, विचार ।
जब अपना दिल ही नहीं, बनता नातेदार ॥
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