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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Fri Sep 12, 2008 5:32 am |
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अध्याय 118. नेत्रों का आतुरता से क्षय
1171
अब राते हैं क्यों नयन, स्वयं दिखा आराध्य ।
मुझे हुआ यह रोग है, जो बन गया असाध्य ॥
1172
सोचे समझे बिन नयन, प्रिय को उस दिन देख ।
अब क्यों होते हैं व्यक्ति, रखते कुछ न विवेक ॥
1173
नयनों ने देखा स्वयं, आतुरता के साथ ।
अब जो रोते हैं स्वयं, है हास्यास्पद बात ॥
1174
मुझमें रुज उत्पन्न कर, असाध्य औ’ अनिवार्य ।
सूख गये, ना कर सके, दृग रोने का कार्य ॥
1175
काम-रोग उत्पन्न कर, सागर से विस्तार ।
नींद न पा मेरे नयन, सहते दुःख अपार ॥
1176
ओहो यह अति सुखद है, मुझको दुख में डाल ।
अब ये दृग सहते स्वयं, यह दुख, हो बेहाल ॥
1177
दिल पसीज, थे देखते, सदा उन्हें दृग सक्त ।
सूख जाय दृग-स्रोत अब, सह सह पीड़ा सख्त ॥
1178
वचन मात्र से प्रेम कर, दिल से किया न प्रेम ।
उस जन को देखे बिना, नेत्रों को नहिं क्षेम ॥
1179
ना आवें तो नींद नहिं, आवें, नींद न आय ।
दोनों हालों में नयन, सहते हैं अति हाय ॥
1180
मेरे सम जिनके नयन, पिटते ढोल समान ।
उससे पुरजन को नहीं, कठिन भेद का ज्ञान ॥
अध्याय 119. पीलापन-जनित पीड़ा
1181
प्रिय को जाने के लिये, सम्मति दी उस काल ।
अब जा कर किससे कहूँ, निज पीलापन-हाल ॥
1182
पीलापन यह गर्व कर, ‘मैं हूँ उनसे प्राप्त’ ।
चढ़ कर मेरी देह में, हो जाता है व्याप्त ॥
1183
पीलापन औ’ रोग का, करके वे प्रतिदान ।
मेरी छवि औ’ लाज का, ले कर चले सुदान ॥
1184
उनके गुण का स्मरण कर, करती हूँ गुण-गान ।
फिर भी पीलापन चढ़ा, तो क्या यह धोखा न ॥
1185
वह देखो, जाते बिछुड़, मेरे प्रियतम आप्त ।
यह देखो, इस देह पर, पीलापन है व्याप्त ॥
1186
दीपक बुझने की यथा, तम की जो है ताक ।
प्रिय-आलिंगन ढील पर, पैलापन की ताक ॥
1187
आलिंगन करके रही, करवट बदली थोर ।
उस क्षण जम कर छा गया, पीलापन यह घोर ॥
1188
‘यह है पीली पड़ गयी’, यों करते हैं बात ।
इसे त्याग कर वे गये, यों करते नहिं बात ॥
1189
मुझे मना कर तो गये, यदि सकुशल हों नाथ ।
तो मेरा तन भी रहे, पीलापन के साथ ॥
1190
अच्छा है पाना स्वयं, पीलापन का नाम ।
प्रिय का तजना बन्धुजन, यदि न करें बदनाम ॥
अध्याय 120. विरह-वेदनातिरेक
1191
जिससे अपना प्यार है, यदि पाती वह प्यार ।
बीज रहित फल प्रेम का, पाती है निर्धार ॥
1192
जीवों का करता जलद, ज्यों जल दे कर क्षेम ।
प्राण-पियारे का रहा, प्राण-प्रिया से प्रेम ॥
1193
जिस नारी को प्राप्त है, प्राण-नाथ का प्यार ।
‘जीऊँगी’ यों गर्व का, उसको है अधिकार ॥
1194
उसकी प्रिया बनी नहीं, जो उसका है प्रेय ।
तो बहुमान्या नारि भी, पुण्यवति नहिं ज्ञेय ॥
1195
प्यार किया मैंने जिन्हें, यदि खुद किया न प्यार ।
तो उनसे क्या हो सके, मेरा कुछ उपकार ॥
1196
प्रेम एक-तरफ़ा रहे, तो है दुखद अपार ।
दोय तरफ़ हो तो सुखद, ज्यों डंडी पर भार ॥
1197
जम कर सक्रिय एक में, रहा मदन बेदर्द ।
क्या वह समझेगा नहीं, मेरा दुःख व दर्द ॥
1198
प्रियतम से पाये बिना, उसका मधुमय बैन ।
जग में जीती स्त्री सदृश, कोई निष्ठुर है न ॥
1199
प्रेम रहित प्रियतम रहे, यद्यपि है यह ज्ञात ।
कर्ण मधुर ही जो मिले, उनकी कोई बात ॥
1200
प्रेम हीन से कठिन रुज, कहने को तैयार ।
रे दिल ! तू चिरजीव रह ! सुखा समुद्र अपार ॥
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