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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Thu Sep 11, 2008 2:47 pm |
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अध्याय 115. प्रवाद-जताना
1141
प्रचलन हुआ प्रवाद का, सो टिकता प्रिय प्राण ।
इसका मेरे भाग्य से, लोगों को नहिं ज्ञान ॥
1142
सुमन-नयन-युत बाल की, दुर्लभता नहिं जान ।
इस पुर ने अफवाह तो, की है मुझे प्रदान ॥
1143
क्या मेरे लायक नहीं, पुरजन-ज्ञात प्रवाह ।
प्राप्त किये बिन मिलन तो, हुई प्राप्त सी बात ॥
1144
पुरजन के अपवाद से, बढ़ जाता है काम ।
घट जायेगा अन्यथा, खो कर निज गुण-नाम ॥
1145
होते होते मस्त ज्यों, प्रिय लगता मधु-पान ।
हो हो प्रकट प्रवाद से, मधुर काम की बान ॥
1146
प्रिय से केवल एक दिन, हुई मिलन की बात ।
लेकिन चन्द्रग्रहण सम, व्यापक हुआ प्रवाद ॥
1147
पुरजन-निंदा खाद है, माँ का कटु वच नीर ।
इनसे पोषित रोग यह, बढ़ता रहा अधीर ॥
1148
काम-शमन की सोचना, कर अपवाद प्रचार ।
अग्नि-शमन घी डाल कर, करना सदृश विचार ॥
1149
अपवादें से क्यों डरूँ, जब कर अभय प्रदान ।
सब को लज्जित कर गये, छोड़ मुझे प्रिय प्राण ॥
1150
निज वांछित अपवाद का, पुर कर रहा प्रचार ।
चाहूँ तो प्रिय नाथ भी, कर देंगे उपकार ॥
अध्याय 116. विरह-वेदना
1151
अगर बिछुड़ जाते नहीं, मुझे जताओ नाथ ।
जो जियें उनसे कहो, झट फिरने की बात ॥
1152
पहले उनकी दृष्टि तो, देती थी सुख-भोग ।
विरह-भीति से दुखद है, अब उनका संयोग ॥
1153
विज्ञ नाथ का भी कभी, संभव रहा प्रवास ।
सो करना संभव नहीं, इनपर भी विश्वास ॥
1154
छोड़ चलेंगे यदि सदय, कर निर्भय का घोष ।
जो दृढ़-वच विश्वासिनी, उसका है क्या दोष ॥
1155
बचा सके तो यों बचा, जिससे चलें न नाथ ।
फिर मिलना संभव नहीं, छोड़ गये यदि साथ ॥
1156
विरह बताने तक हुए, इतने निठुर समर्थ ।
प्रेम करेंगे लौट कर, यह आशा है व्यर्थ ॥
1157
नायक ने जो छोड़ कर, गमन किया, वह बात ।
वलय कलाई से पतित, क्या न करें विख्यात ॥
1158
उस पुर में रहना दुखद, जहाँ न साथिन लोग ।
उससे भी बढ़ कर दुखद, प्रिय से रहा वियोग ॥
1159
छूने पर ही तो जला, सकती है, बस आग ।
काम-ज्वर सम वह जला, सकती क्या, कर त्याग ॥
1160
दुखद विरह को मानती, चिन्ता; व्याधि न नेक ।
विरह-वेदना सहन कर, जीवित रहीं अनेक ॥
अध्याय 117. विरह-क्षमा की व्यथा
1161
यथा उलीचे सोत का, बढ़ता रहे बहाव ।
बढ़ता है यह रोग भी, यदि मैं करूँ छिपाव ॥
1162
गोपन भी इस रोग का, है नहिं वश की बात ।
कहना भी लज्जाजनक, रोगकार से बात ॥
1163
मेरी दुबली देह में, प्राणरूप जो डांड ।
लटके उसके छोर में, काम व लज्जा कांड ॥
1164
काम-रोग का तो रहा, पारावार अपार ।
पर रक्षक बेड़ा नहीं, उसको करने पार ॥
1165
जो देते हैं वेदना, रह कर प्रिय जन, खैर ।
क्या कर बैठेंगे अहो, यदि रखते हैं वैर ॥
1166
जो है, बस, यह काम तो, सुख का पारावार ।
पीडा दे तो दुःख है, उससे बड़ा अपार ॥
1167
पार न पाती पैर कर, काम-समुद्र महान ।
अर्द्ध रात्रि में भी निविड़, रही अकेली जान ॥
1168
सुला जीव सब को रही, दया-पात्र यह रात ।
इसको मुझको छोड़ कर, और न कोई साथ ॥
1169
ये रातें जो आजकल, लम्बी हुई अथोर ।
निष्ठुर के नैष्ठुर्य से, हैं खुद अधिक कठोर ॥
1170
चल सकते हैं प्रिय के यहाँ, यदि झट हृदय समान ।
नहीं तैरते बाढ़ में, यों मेरे दृग, जान ॥
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