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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Wed Sep 10, 2008 4:08 am |
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अध्याय 112. सौन्दर्य वर्णन
1111
रे अनिच्च तू धन्य है, तू है कोमल प्राण ।
मेरी जो है प्रियतमा, तुझसे मृदुतर जान ॥
1112
बहु-जन-दृष्ट सुमन सदृश, इसके दृग को मान ।
रे मन यदि देखो सुमन, तुम हो भ्रमित अजान ॥
1113
पल्लव तन, मोती रदन, प्राकृत गंध सुगंध ।
भाला कजरारा नयन, जिसके बाँस-स्कंध ॥
1114
कुवलय दल यदि देखता, सोच झुका कर सीस ।
इसके दृग सम हम नहीं, होती उसको खीस ॥
1115
धारण किया अनिच्च को, बिना निकाले वृन्त ।
इसकी कटि हिन ना बजे, मंगल बाजा-वृन्द ॥
1116
महिला मुख औ’ चन्द्र में, उड्डगण भेद न जान ।
निज कक्षा से छूट कर, होते चलायमान ॥
1117
क्षय पाकर फिर पूर्ण हो, शोभित रहा मयंक ।
इस नारी के वदन पर, रहता कहाँ कलंक ॥
1118
इस नारी के वदन सम, चमक सके तो चाँद ।
प्रेम-पात्र मेरा बने, चिरजीवी रह चाँद ॥
1119
सुमन-नयन युत वदन सम, यदि होने की चाह ।
सबके सम्मुख चन्द्र तू चमक न बेपरवाह ॥
1120
मृदु अनिच्च का फूल औ’, हंसी का मृदु तूल ।
बाला के मृदु पाद हित, रहे गोखरू शूल ॥
अध्याय 113. प्रेम-प्रशंसा
1121
मधुर भाषिणी सुतुनु का, सित रद निःसृत नीर ।
यों लगता है मधुर वह, ज्यों मधु-मिश्रित क्षीर ॥
1122
जैसा देही देह का, होता है सम्बन्ध ।
वैसा मेरे, नारि के, बीच रहा सम्बन्ध ॥
1123
पुतली में पुतली अरी, हट जाओ यह जान ।
मेरी ललित ललाटयुत, प्यारी को नहिं स्थान ॥
1124
जीना सम है प्राण हित, बाला, जब संयोग ।
मरना सम उसके लिये, होता अगर वियोग ॥
1125
लड़ते दृग युत बाल के, गुण यदि जाऊँ भूल ।
तब तो कर सकता स्मरण, पर जाता नहिं भूल ॥
1126
दृग में से निकलें नहीं, मेरे सुभग सुजान ।
झपकी लूँ तो हो न दुख, वे हैं सूक्ष्म प्राण ॥
1127
यों विचार कर नयन में, करते वास सुजान ।
नहीं आंजतीं हम नयन, छिप जायेंगे जान ॥
1128
यों विचार कर हृदय में, करते वास सुजान ।
खाने से डर है गरम, जल जायेंगे जान ॥
1129
झपकी लूँ तो ज्ञात है, होंगे नाथ विलीन ।
पर इससे पुरजन उन्हें, कहते प्रेम विहीन ॥
1130
यद्यपि दिल में प्रिय सदा, रहे मज़े में लीन ।
पुरजन कहते तज चले, कहते प्रेम विहीन ॥
अध्याय 114. लज्जा-त्याग-कथन
1131
जो चखने पर प्रेम रस, सहें वेदना हाय ।
‘मडल’-सुरक्षा के बिना, उन्हें न सबल सहाय ॥
1132
आत्मा और शरीर भी, सह न सके जो आग ।
चढ़े ‘मडल’ पर धैर्य से, करके लज्जा त्याग ॥
1133
पहले मेरे पास थीं, सुधीरता और लाज ।
कामी जन जिसपर चढ़ें, वही ‘मडल’ है आज ॥
1134
मेरी थी लज्जा तथा, सुधीरता की नाव ।
उसे बहा कर ले गया, भीषण काम-बहाव ॥
1135
माला सम चूड़ी सजे, जिस बाला के हाथ ।
उसने संध्या-विरह-दुख, दिया ‘मडल’ के साथ ॥
1136
कटती मुग्धा की वजह, आँखों में ही रात ।
अर्द्ध-रात्रि में भी ‘मडल’, आता ही है याद ॥
1137
काम-वेदना जलधि में, रहती मग्न यथेष्ट ।
फिर भी ‘मडल’ न जो चढे, उस स्त्री से नहिं श्रेष्ठ ॥
1138
संयम से रहती तथा, दया-पात्र अति वाम ।
यह न सोच कर छिप न रह, प्रकट हुआ है काम ॥
1139
मेरा काम यही समझ, सबको वह नहिं ज्ञात ।
नगर-वीथि में घूमता, है मस्ती के साथ ॥
1140
रहे भुक्त-भोगी नहीं, यथा चुकी हूँ भोग ।
हँसते मेरे देखते, बुद्धि हीन जो लोग ॥
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