|
prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
|
Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
|
|
 |
Posted: Fri Sep 05, 2008 6:01 pm |
|
 |

|
 |
 |
भाग–३: काम- कांड.
अध्याय 109. सौन्दर्य की पीड़ा
1081
क्या यह है देवांगना, या सुविशेष मयूर ।
या नारी कुंड़ल-सजी, मन है भ्रम में चूर ॥
1082
दृष्टि मिलाना सुतनु का, होते दृष्टि-निपान ।
हो कर खुद चँडी यथा, चढ़ आये दल साथ ॥
1083
पहले देखा है नहीं, अब देखा यम कौन ।
लडते विशाल नेत्रयुत, वह है स्त्री-गुण-भौन ॥
1084
मुग्धा इस स्त्री-रत्न के, दिखी दृगों की रीत ।
खाते दर्शक-प्राण हैं, यों है गुण विपरीत ॥
1085
क्या यम है, या आँख है, या है मृगी सुरंग ।
इस मुग्धा की दृष्टि में, है तीनों का ढंग ॥
1086
ऋजु हो टेढ़ी भृकुटियाँ, मना करें दे छाँह ।
तो इसकी आँखें मुझे, हिला, न लेंगी आह ॥
1087
अनत कुचों पर नारि के, पड़ा रहा जो पाट ।
मद-गज के दृग ढ़ांकता, मुख-पट सम वह ठाट ॥
1088
उज्जवल माथे से अहो, गयी शक्ति वह रीत ।
भिड़े बिना रण-भूमि में, जिससे रिपु हों भीत ॥
1089
सरल दृष्टि हरिणी सदृश, औ’ रखती जो लाज ।
उसके हित गहने बना, पहनाना क्या काज ॥
1090
हर्षक है केवल उसे, जो करता है पान ।
दर्शक को हर्षक नहीं, मधु तो काम समान ॥
अध्याय 110. संकेत समझना
1091
इसके कजरारे नयन, रखते हैं दो दृष्टि ।
रोग एक, उस रोग की, दवा दूसरी दृष्टि ॥
1092
आंख बचा कर देखना, तनिक मुझे क्षण काल ।
अर्द्ध नहीं, संयोग का, उससे अधिक रसाल ॥
1093
देखा, उसने देख कर, झुका लिया जो सीस ।
वह क्यारी में प्रेम की, देना था जल सींच ॥
1094
मैं देखूँ तो डालती, दृष्टि भूमि की ओर ।
ना देखूँ तो देख खुद, मन में रही हिलोर ॥
1095
सीधे वह नहीं देखती, यद्यपि मेरी ओर ।
सुकुचाती सी एक दृग, मन में रही हिलोर ॥
1096
यदुअपि वह अनभिज्ञ सी, करती है कटु बात ।
बात नहीं है क्रुद्ध की, झट होती यह ज्ञात ॥
1097
रुष्ट दृष्टि है शत्रु सम, कटुक वचन सप्रीति ।
दिखना मानों अन्य जन, प्रेमी जन की रीति ॥
1098
मैं देखूँ तो, स्निग्ध हो, करे मंद वह हास ।
सुकुमारी में उस समय, एक रही छवी ख़ास ॥
1099
उदासीन हो देखना, मानों हो अनजान ।
प्रेमी जन के पास ही, रहती ऐसी बान ॥
1100
नयन नयन मिल देखते, यदि होता है योग ।
वचनों का मूँह से कहे, है नहिं कुछ उपयोग ॥
अध्याय 111. संयोग का आनन्द
1101
पंचेन्द्रिय सुख, रूप औ’, स्पर्श गंध रस शब्द ।
उज्ज्वल चूड़ी से सजी, इसमें सब उपलब्ध ॥
1102
रोगों की तो है दवा, उनसे अलग पदार्थ ।
जो सुतनू का रोग है, दवा वही रोगार्थ ॥
1103
निज दयिता मृदु स्कंध पर, सोते जो आराम ।
उससे क्या रमणीय है, कमल-नयन का धाम ॥
1104
हटने पर देती जला, निकट गया तो शीत ।
आग कहाँ से पा गयी, बाला यह विपरीत ॥
1105
इच्छित ज्यों इच्छित समय, आकर दें आनन्द ।
पुष्पालंकृत केशयुत, हैं बाला के स्कंध ॥
1106
लगने से हर बार है, नवजीवन का स्पंद ।
बने हुए हैं अमृत के, इस मुग्धा के स्कंध ॥
1107
स्वगृह में स्वपादर्थ का, यथा बाँट कर भोग ।
रहा गेहुँए रंग की, बाला से संयोग ॥
1108
आलिंगन जो यों रहा, बीच हवा-गति बंद ।
दोनों को, प्रिय औ’ प्रिया, देता है आनन्द ॥
1109
मान मनावन मिलनसुख, ये जो हैं फल-भोग ।
प्रेम-पाश में जो पड़े, उनको है यह भोग ॥
1110
होते होते ज्ञान के, यथा ज्ञात अज्ञान ।
मिलते मिलते सुतनु से, होता प्रणय-ज्ञान ॥
|