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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Tue Sep 02, 2008 8:00 am |
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अध्याय 107. याचना-भय
1061
जो न छिपा कर, प्रेम से, करते दान यथेष्ट ।
उनसे भी नहिं माँगना, कोटि गुना है श्रेष्ठ ॥
1062
यदि विधि की करतार ने, भीख माँग नर खाय ।
मारा मारा फिर वही, नष्ट-भ्रष्ट हो जाय ॥
1063
‘निर्धनता के दुःख को, करें माँग कर दूर’ ।
इस विचार से क्रूरतर, और न है कुछ क्रूर ॥
1064
दारिदवश भी याचना, जिसे नहीं स्वीकार ।
भरने उसके पूर्ण-गुण, काफी नहिं संसार ॥
1065
पका माँड ही क्यों न हो, निर्मल नीर समान ।
खाने से श्रम से कमा, बढ़ कर मधुर न जान ॥
1066
यद्यपि माँगे गाय हित, पानी का ही दान ।
याचन से बदतर नहीं, जिह्वा को अपमान ॥
1067
याचक सबसे याचना, यही कि जो भर स्वाँग ।
याचन करने पर न दें, उनसे कभी न माँग ॥
1068
याचन रूपी नाव यदि, जो रक्षा बिन नग्न ।
गोपन की चट्टान से, टकराये तो भग्न ॥
1069
दिल गलता है, ख्याल कर, याचन का बदहाल ।
गले बिना ही नष्ट हो, गोपन का कर ख्याल ॥
1070
‘नहीं’ शब्द सुन जायगी, याचक जन की जान ।
गोपन करते मनुज के, कहाँ छिपेंगे प्राण ॥
अध्याय 108. नीचता
1071
हैं मनुष्य के सदृश ही, नीच लोग भी दृश्य ।
हमने तो देखा नहीं, ऐसा जो सादृश्य ॥
1072
चिन्ता धर्माधर्म की, नहीं हृदय के बीच ।
सो बढ़ कर धर्मज्ञ से, भाग्यवान हैं नीच ॥
1073
नीच लोग हैं देव सम, क्योंकि निरंकुश जीव ।
वे भी करते आचरण, मनमानी बिन सींव ॥
1074
मनमौजी ऐसा मिले, जो अपने से खर्व ।
तो उससे बढ़ खुद समझ, नीच करेगा गर्व ॥
1075
नीचों के आचार का, भय ही है आधार ।
भय बिन भी कुछ तो रहे, यदि हो लाभ-विचार ॥
1076
नीच मनुज ऐसा रहा, जैसा पिटता ढोल ।
स्वयं सुने जो भेद हैं, ढो अन्यों को खोल ॥
1077
गाल-तोड़ घूँसा बिना, जो फैलाये हाथ ।
झाडेंगे नहिं अधम जन, निज झूठा भी हाथ ॥
1078
सज्जन प्रार्थन मात्र से, देते हैं फल-दान ।
नीच निचोड़ों ईख सम, तो देते रस-पान ॥
1079
खाते पीते पहनते, देख पराया तोष ।
छिद्रान्वेषण-चतुर जो, नीच निकाले दोष ॥
1080
नीच लोग किस योग्य हों, आयेंगे क्या काम ।
संकट हो तो झट स्वयं, बिक कर बनें गुलाम ॥
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