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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Mon Sep 01, 2008 4:59 am |
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अध्याय 104. कृषि
1031
कृषि-अधीन ही जग रहा, रह अन्यों में घुर्ण ।
सो कृषि सबसे श्रेष्ठ है, यद्यपि है श्रमपूर्ण ॥
1032
जो कृषि की क्षमता बिना, करते धंधे अन्य ।
कृषक सभी को वहन कर, जगत-धुरी सम गण्य ॥
1033
जो जीवित हैं हल चला, उनका जीवन धन्य ।
झुक कर खा पी कर चलें, उनके पीचे अन्य ॥
1034
निज नृप छत्रच्छाँह में, कई छत्रपति शान ।
छाया में पल धान की, लाते सौम्य किसान ॥
1035
निज कर से हल जोत कर, खाना जिन्हें स्वभाव ।
माँगें नहिं, जो माँगता, देंगे बिना दुराव ॥
1036
हाथ खिँचा यदि कृषक का, उनकी भी नहिं टेक ।
जो ऐसे कहते रहे ‘हम हैं निस्पृह एक’ ॥
1037
एक सेर की सूख यदि, पाव सेर हो धूल ।
मुट्ठी भर भी खाद बिन, होगी फ़सल अतूल ॥
1038
खेत जोतने से अधिक, खाद डालना श्रेष्ठ ।
बाद निराकर सींचना, फिर भी रक्षण श्रेष्ठ ॥
1039
चल कर यदि देखे नहीं, मालिक दे कर ध्यान ।
गृहिणी जैसी रूठ कर, भूमि करेगी मान ॥
1040
‘हम दरिद्र हैं’ यों करे, सुस्ती में आलाप ।
भूमि रूप देवी उसे, देख हँसेगी आप ॥
अध्याय 105. दरिद्रता
1041
यदि पूछो दारिद्र्य सम, दुःखद कौन महान ।
तो दुःखद दारिद्र्य सम, दारिद्रता ही जान ॥
1042
निर्धनता की पापिनी, यदि रहती है साथ ।
लोक तथा परलोक से, धोना होगा हाथ ॥
1043
निर्धनता के नाम से, जो है आशा-पाश ।
कुलीनता, यश का करे, एक साथ ही नाश ॥
1044
निर्धनता पैदा करे, कुलीन में भी ढील ।
जिसके वश वह कह उठे, हीन वचन अश्लील ॥
1045
निर्धनता के रूप में, जो है दुख का हाल ।
उसमें होती है उपज, कई तरह की साल ॥
1046
यद्यपि अनुसंधान कर, कहे तत्व का अर्थ ।
फिर भी प्रवचन दिन का, हो जाता है व्यर्थ ॥
1047
जिस दरिद्र का धर्म से, कुछ भी न अभिप्राय ।
जननी से भी अन्य सम, वह तो देखा जाय ॥
1048
कंगाली जो कर चुकी, कल मेरा संहार ।
अयोगी क्या आज भी, करने उसी प्रकार ॥
1049
अन्तराल में आग के, सोना भी है साध्य ।
आँख झपकना भी ज़रा, दारिद में नहिं साध्य ॥
1050
भोग्य-हीन रह, दिन का, लेना नहिं सन्यास ।
माँड-नमक का यम बने, करने हित है नाश ॥
अध्याय 106. याचना
1051
याचन करने योग्य हों, तो माँगना ज़रूर ।
उनका गोपन-दोष हो, तेरा कुछ न कसूर ॥
1052
यचित चीज़ें यदि मिलें, बिना दिये दुख-द्वन्द ।
याचन करना मनुज को, देता है आनन्द ॥
1053
खुला हृदय रखते हुए, जो मानेंगे मान ।
उनके सम्मुख जा खड़े, याचन में भी शान ॥
1054
जिन्हें स्वप्न में भी ‘नहीं’, कहने की नहिं बान ।
उनसे याचन भी रहा, देना ही सम जान ॥
1055
सम्मुख होने मात्र से, बिना किये इनकार ।
दाता हैं जग में, तभी, याचन है स्वीकार ॥
1056
उन्हें देख जिनको नहीं, ‘ना’, कह सहना कष्ट ।
दुःख सभी दारिद्र्य के, एक साथ हों नष्ट ॥
1057
बिना किये अवहेलना, देते जन को देख ।
मन ही मन आनन्द से, रहा हर्ष-अतिरेक ॥
1058
शीतल थलयुत विपुल जग, यदि हो याचक-हीन ।
कठपुथली सम वह रहे, चलती सूत्राधीन ॥
1059
जब कि प्रतिग्रह चाहते, मिलें न याचक लोग ।
दाताओं को क्या मिले, यश पाने का योग ॥
1060
याचक को तो चाहिये, ग्रहण करे अक्रोध ।
निज दरिद्रता-दुःख ही, करे उसे यह बोध ॥
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