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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Fri Aug 29, 2008 12:50 pm |
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[b] अध्याय 101. निष्फल धन
1001
भर कर घर भर प्रचुर धन, जो करता नहिं भोग ।
धन के नाते मृतक है, जब है नहिं उपयोग ॥
1002
‘सब होता है अर्थ से’, रख कर ऐसा ज्ञान ।
कंजूसी के मोह से, प्रेत-जन्म हो मलान ॥
1003
लोलुप संग्रह मात्र का, यश का नहीं विचार ।
ऐसे लोभी का जनम, है पृथ्वी को भार ॥
1004
किसी एक से भी नहीं, किया गया जो प्यार ।
निज अवशेष स्वरूप वह, किसको करे विचार ॥
1005
जो करते नहिं दान ही, करते भी नहिं भोग ।
कोटि कोटि धन क्यों न हो, निर्धन हैं वे लोग ॥
1006
योग्य व्यक्ति को कुछ न दे, स्वयं न करता भोग ।
विपुल संपदा के लिये, इस गुण का नर रोग ॥
1007
कुछ देता नहिं अधन को, ऐसों का धन जाय ।
क्वाँरी रह अति गुणवती, ज्यों बूढ़ी हो जाय ॥
1008
अप्रिय जन के पास यदि, आश्रित हो संपत्ति ।
ग्राम-मध्य विष-वृक्ष ज्यों, पावे फल-संपत्ति ॥
1009
प्रेम-भाव तज कर तथा, भाव धर्म से जन्य ।
आत्म-द्रोह कर जो जमा, धन हथियाते अन्य ॥
1010
उनकी क्षणिक दरिद्रता, जो नामी धनवान ।
जल से खाली जलद का, है स्वभाव समान ॥
अध्याय 102. लज्जाशीलता
1011
लज्जित होना कर्म से, लज्जा रही बतौर ।
सुमुखी कुलांगना-सुलभ, लज्जा है कुछ और ॥
1012
अन्न वस्त्र इत्यादि हैं, सब के लिये समान ।
सज्जन की है श्रेष्ठता, होना लज्जावान ॥
1013
सभी प्राणियों के लिये, आश्रय तो है देह ।
रखती है गुण-पूर्णता, लज्जा का शुभ गेह ॥
1014
भूषण महानुभाव का, क्या नहिं लज्जा-भाव ।
उसके बिन गंभीर गति, क्या नहिं रोग-तनाव ॥
1015
लज्जित है, जो देख निज, तथा पराया दोष ।
उनको कहता है जगत, ‘यह लज्जा का कोष’ ॥
1016
लज्जा को घेरा किये, बिना सुरक्षण-योग ।
चाहेंगे नहिं श्रेष्ठ जन, विस्तृत जग का भोग ॥
1017
लज्जा-पालक त्याग दें, लज्जा के हित प्राण ।
लज्जा को छोड़ें नहीं, रक्षित रखने जान ॥
1018
अन्यों को लज्जित करे, करते ऐसे कर्म ।
उससे खुद लज्जित नहीं, तो लज्जित हो धर्म ॥
1019
यदि चूके सिद्धान्त से, तो होगा कुल नष्ट ।
स्थाई हो निर्लज्जता, तो हों सब गुण नष्ट ॥
1020
कठपुथली में सूत्र से, है जीवन-आभास ।
त्यों है लज्जाहीन में, चैतन्य का निवास ॥
अध्याय 103. वंशोत्कर्ष-विधान
1021
‘हाथ न खींचूँ कर्म से, जो कुल हित कर्तव्य ।
इसके सम नहिं श्रेष्ठता, यों है जो मन्तव्य ॥
1022
सत् प्रयत्न गंभीर मति, ये दोनों ही अंश ।
क्रियाशील जब हैं सतत, उन्नत होता वंश ॥
1023
‘कुल को अन्नत में करूँ’, कहता है दृढ बात ।
तो आगे बढ़ कमर कस, दैव बँटावे हाथ ॥
1024
कुल हित जो अविलम्ब ही, हैं प्रयत्न में चूर ।
अनजाने ही यत्न वह, बने सफलता पूर ॥
1025
कुल अन्नति हित दोष बिन, जिसका है आचार ।
बन्धु बनाने को उसे, घेर रहा संसार ॥
1026
स्वयं जनित निज वंश का, परिपालन का मान ।
अपनाना है मनुज को, उत्तम पौरुष जान ॥
1027
महावीर रणक्षेत्र में, ज्यों हैं जिम्मेदार ।
त्यों है सुयोग्य व्यक्ति पर, निज कुटुंब का भार ॥
1028
कुल-पालक का है नहीं, कोई अवसर खास ।
आलसवश मानी बने, तो होता है नाश ॥
1029
जो होने देता नहीं, निज कुटुंब में दोष ।
उसका बने शरीर क्या, दुख-दर्दों का कोष ॥
1030
योग्य व्यक्ति कुल में नहीं, जो थामेगा टेक ।
जड़ में विपदा काटते, गिर जाये कुल नेक ॥[/size][/b][size=18]
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