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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Thu Aug 28, 2008 9:07 am |
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[size=18]अध्याय 98. महानता
971
मानव को विख्याति दे, रहना सहित उमंग ।
‘जीयेंगे उसके बिना’, है यों कथन कलक ॥
972
सभी मनुज हैं जन्म से, होते एक समान ।
गुण-विशेष फिर सम नहीं, कर्म-भेद से जान ॥
973
छोटे नहिं होते बड़े, यद्यपि स्थिति है उच्च ।
निचली स्थिति में भी बड़े, होते हैं नहिं तुच्छ ॥
974
एक निष्ठ रहती हुई, नारी सती समान ।
आत्म-संयमी जो रहा, उसका हो बहुमान ॥
975
जो जन महानुभव हैं, उनको है यह साध्य ।
कर चुकना है रीति से, जो हैं कार्य असाध्य ॥
976
छोटों के मन में नहीं, होता यों सुविचार ।
पावें गुण नर श्रेष्ठ का, कर उनका सत्कार ॥
977
लगती है संपन्नता, जब ओछों के हाथ ।
तब भी अत्याचार ही, करे गर्व के साथ ॥
978
है तो महानुभावता, विनयशील सब पर्व ।
अहम्मन्य हो तुच्छता, करती है अति गर्व ॥
979
अहम्मन्यता-हीनता, है महानता बान ।
अहम्मन्यता-सींव ही, ओछापन है जान ॥
980
दोषों को देना छिपा, है महानता-भाव ।
दोषों की ही घोषणा, है तुच्छत- स्वभाव ॥
अध्याय 99. सर्वगुण-पूर्णता
981
जो सब गुण हैं पालते, समझ योग्य कर्तव्य ।
उनकों अच्छे कार्य सब, सहज बने कर्तव्य ॥
982
गुण-श्रेष्ठता-लाभ ही, महापुरुष को श्रेय ।
अन्य लाभ की प्राप्ति से, श्रेय न कुछ भी ज्ञेय ॥
983
लोकोपकारिता, दया, प्रेम हया औ’ साँच ।
सुगुणालय के थामते, खंभे हैं ये पाँच ॥
984
वध-निषेध-व्रत-लाभ ही, तप को रहा प्रधान ।
पर-निंदा वर्जन रही, गुणपूर्णता महान ॥
985
विनयशीलता जो रही, बलवानों का सार ।
है रिपु-रिपुता नाश-हित, सज्जन का हथियार ॥
986
कौन कसौटी जो परख, जाने गुण-आगार ।
है वह गुण जो मान ले, नीचों से भी हार ॥
987
अपकारी को भी अगर, किया नहीं उपकार ।
होता क्या उपयोग है, हो कर गुण-आगार ॥
988
निर्धनता नर के लिये, होता नहिं अपमान ।
यदि बल है जिसको कहें, सर्व गुणों की खान ॥
989
गुण-सागर के कूल सम, जो मर्यादा-पाल ।
मर्यादा छोड़े नहीं, यद्यपि युगान्त-काल ॥
990
घटता है गुण-पूर्ण का, यदि गुण का आगार ।
तो विस्तृत संसार भी, ढो सकता नहिं भार ॥
अध्याय 100. शिष्टाचार
991
मिलनसार रहते अगर, सब लोगों को मान ।
पाना शिष्टाचार है, कहते हैं आसान ॥
992
उत्तम कुल में जन्म औ’, प्रेम पूर्ण व्यवहार ।
दोनों शिष्टाचार के, हैं ही श्रेष्ठ प्रकार ॥
993
न हो देह के मेल से, श्रेष्ठ जनों का मेल ।
आत्माओं के योग्य तो, हैं संस्कृति का मेल ॥
994
नीति धर्म को चाहते, जो करते उपकार ।
उनके शिष्ट स्वभाव को, सराहता संसार ॥
995
हँसी खेल में भी नहीं, निंदा करना इष्ट ।
पर-स्वभाव ज्ञाता रहें, रिपुता में भी शिष्ट ॥
996
शिष्टों के आधार पर, टिकता है संसार ।
उनके बिन तो वह मिले, मिट्टी में निर्धार ॥
997
यद्यपि हैं रेती सदृश, तीक्षण बुद्धि-निधान ।
मानव-संस्कृति के बिना, नर हैं वृक्ष समान ॥
998
मित्र न रह जो शत्रु हैं, उनसे भी व्यवहार ।
सभ्य पुरुष का नहिं किया, तो वह अधम विचार ॥
999
जो जन कर सकते नहीं, प्रसन्न मन व्यवहार ।
दिन में भी तम में पड़ा, है उनका संसार ॥
1000
जो है प्राप्त असभ्य को, धन-सम्पत्ति अमेय ।
कलश-दोष से फट गया, शुद्ध दूध सम ज्ञेय ॥[/size]
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