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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Thu Aug 28, 2008 8:09 am |
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अध्याय 95. औषध
941
वातादिक जिनको गिना, शास्त्रज्ञों ने तीन ।
बढ़ते घटते दुःख दें, करके रोगाधीन ॥
942
खादित का पचना समझ, फिर दे भोजन-दान ।
तो तन को नहिं चाहिये, कोई औषध-पान ॥
943
जीर्ण हुआ तो खाइये, जान उचित परिमाण ।
देहवान हित है वही, चिरायु का सामान ॥
944
जीर्ण कुआ यह जान फिर, खूब लगे यदि भूख ।
खाओ जो जो पथ्य हैं, रखते ध्यान अचूक ॥
945
करता पथ्याहार का, संयम से यदि भोग ।
तो होता नहिं जीव को, कोई दुःखद रोग ॥
946
भला समझ मित भोज का, जीमे तो सुख-वास ।
वैसे टिकता रोग है, अति पेटू के पास ॥
947
जाठराग्नि की शक्ति का, बिना किये सुविचार ।
यदि खाते हैं अत्याधिक, बढ़ते रोग अपार ॥
948
ठीक समझ कर रोग क्या, उसका समझ निदान ।
समझ युक्ति फिर शमन का, करना यथा विधान ॥
949
रोगी का वय, रोग का, काल तथा विस्तार ।
सोच समझकर वैद्य को, करना है उपचार ॥
950
रोगी वैद्य देवा तथा, तीमारदार संग ।
चार तरह के तो रहे, वैद्य शास्त्र के अंग ॥
अध्याय 96. कुलीनता
951
लज्जा, त्रिकरण-एकता, इन दोनों का जोड़ ।
सहज मिले नहिं और में, बस कुलीन को छोड़ ॥
952
सदाचार लज्जा तथा, सच्चाई ये तीन ।
इन सब से विचलित कभी, होते नहीं कुलीन ॥
953
सुप्रसन्न मुख प्रिय वचन, निंदा-वर्जन दान ।
सच्चे श्रेष्ठ कुलीन हैं, चारों का संस्थान ॥
954
कोटि कोटि धन ही सही, पायें पुरुष कुलीन ।
तो भी वे करते नहीं, रहे कर्म जो हीन ॥
955
हाथ खींचना ही पड़े, यद्यपि हो कर दीन ।
छोडें वे न उदारता, जिनका कुल प्राचीन ॥
956
पालन करते जी रहें, जो निर्मल कुल धर्म ।
यों जो हैं वे ना करें, छल से अनुचित कर्म ॥
957
जो जन बडे कुलीन हैं, उन पर लगा कलंक ।
नभ में चन्द्र-कलंक सम, प्रकटित हो अत्तंग ॥
958
रखते सुगुण कुलीन के, जो निकले निःस्नेह ।
उसके कुल के विषय में, होगा ही संदेह ॥
959
अंकुर करता है प्रकट, भू के गुण की बात ।
कुल का गुण, कुल-जात की, वाणी करती ज्ञात ॥
960
जो चाहे अपना भला, पकडे लज्जा-रीत ।
जो चाहे कुल-कानि को, सब से रहे विनीत ॥
अध्याय 97. मान
961
जीवित रहने के लिये, यद्यपि है अनिवार्य ।
फिर भी जो कुल-हानिकर, तज देना वे कार्य ॥
962
जो हैं पाना चाहते, कीर्ति सहित सम्मान ।
यश-हित भी करते नहीं, जो कुल-हित अपमान ॥
963
सविनय रहना चाहिये, रहते अति संपन्न ।
तन कर रहना चाहिये, रहते बड़ा विपन्न ॥
964
गिरते हैं जब छोड़कर, निज सम्मानित स्थान ।
नर बनते हैं यों गिरे, सिर से बाल समान ॥
965
अल्प घुंघची मात्र भी, करते जो दुष्काम ।
गिरि सम ऊँचे क्यों न हों, होते हैं बदनाम ॥
966
न तो कीर्ति की प्राप्ति हो, न हो स्वर्ग भी प्राप्त ।
निंदक का अनुचर बना, तो औ’ क्या हो प्राप्त ॥
967
निंदक का अनुचर बने, जीवन से भी हेय ।
‘ज्यों का त्यों रह मर गया’, कहलाना है श्रेय ॥
968
नाश काल में मान के, जो कुलीनता-सत्व ।
तन-रक्षित-जीवन भला, क्या देगा अमरत्व ॥
969
बाल कटा तो त्याग दे, चमरी-मृग निज प्राण ।
उसके सम नर प्राण दें, रक्षा-हित निज मान ॥
970
जो मानी जीते नहीं, होने पर अपमान ।
उनके यश को पूज कर, लोक करे गुण-गान ॥
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