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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Mon Aug 25, 2008 1:49 pm |
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अध्याय 92. वार-वनिता
911
चाह नहीं है प्रेमवश, धनमूलक है चाह ।
ऐसी स्त्री का मधुर वच, ले लेता है आह ॥
912
मधुर वचन है बोलती, तोल लाभ का भाग ।
वेश्या के व्यवहार को, सोच समागम त्याग ॥
913
पण-स्त्री आलिंगन रहा, यों झूठा ही जान ।
ज्यों लिपटे तम-कोष्ठ में, मुरदे से अनजान ॥
914
रहता है परमार्थ में, जिनका मनोनियोग ।
अर्थ-अर्थिनी तुच्छ सुख, करते नहिं वे भोग ॥
915
सहज बुद्धि के साथ है, जिनका विशिष्ट ज्ञान ।
पण्य-स्त्री का तुच्छ सुख, भोगेंगे नहिं जान ॥
916
रूप-दृप्त हो तुच्छ सुख, जो देती हैं बेच ।
निज यश-पालक श्रेष्ठ जन, गले लगें नहिं, हेच ॥
917
करती है संभोग जो, लगा अन्य में चित्त ।
उससे गले लगे वही, जिसका चंचल चित्त ॥
918
जो स्त्री है मायाविनी, उसका भोग विलास ।
अविवेकी जन के लिये, रहा मोहिनी-पाश ॥
919
वेश्या का कंधा मृदुल, भूषित है जो खूब ।
मूढ-नीच उस नरक में, रहते हैं कर डूब ॥
920
द्वैध-मना व्यभिचारिणी, मद्य, जुए का खेल ।
लक्ष्मी से जो त्यक्त हैं, उनका इनसे मेल ॥
अध्याय 93. मद्य-निषेध
921
जो मधु पर आसक्त हैं, खोते हैं सम्मान ।
शत्रु कभी डरते नहीं, उनसे कुछ भय मान ॥
922
मद्य न पीना, यदि पिये, वही पिये सोत्साह ।
साधु जनों के मान की, जिसे नहीं परवाह ॥
923
माँ के सम्मुख भी रही, मद-मत्तता खराब ।
तो फिर सम्मुख साधु के, कितनी बुरी शराब ॥
924
जग-निंदित अति दोषयुत, जो हैं शराबखोर ।
उनसे लज्जा-सुन्दरी, मूँह लेती है मोड़ ॥
925
विस्मृति अपनी देह की, क्रय करना दे दाम ।
यों जाने बिन कर्म-फल, कर देना है काम ॥
926
सोते जन तो मृतक से, होते हैं नहिं भिन्न ।
विष पीते जन से सदा, मद्यप रहे अभिन्न ॥
927
जो लुक-छिप मधु पान कर, खोते होश-हवास ।
भेद जान पुर-जन सदा, करते हैं परिहास ॥
928
‘मधु पीना जाना नहीं’, तज देना यह घोष ।
पीने पर झट हो प्रकट, मन में गोपित दोष ॥
929
मद्यप का उपदेश से, होना होश-हवास ।
दीपक ले जल-मग्न की, करना यथा तलाश ॥
930
बिना पिये रहते समय, मद-मस्त को निहार ।
सुस्ती का, पीते स्वयं, करता क्यों न विचार ॥
अध्याय 94. जुआ
931
चाह जुए की हो नहीं, यद्यपि जय स्वाधीन ।
जय भी तो कांटा सदृश, जिसे निगलता मीन ॥
932
लाभ, जुआरी, एक कर, फिर सौ को खो जाय ।
वह भी क्या सुख प्राप्ति का, जीवन-पथ पा जाय ॥
933
पासा फेंक सदा रहा, करते धन की आस ।
उसका धन औ’ आय सब, चलें शत्रु के पास ॥
934
करता यश का नाश है, दे कर सब दुख-जाल ।
और न कोई द्यूत सम, बनायगा कंगाल ॥
935
पासा, जुआ-घर तथा, हस्य-कुशलता मान ।
जुए को हठ से पकड़, निर्धन हुए निदान ॥
936
जुआरूप ज्येष्ठा जिन्हें, मूँह में लेती ड़ाल ।
उन्हें न मिलता पेट भर, भोगें दुख कराल ॥
937
द्यूत-भुमि में काल सब, जो करना है वास ।
करता पैतृक धन तथा, श्रेष्ठ गुणों का नाश ॥
938
पेरित मिथ्या-कर्म में, करके धन को नष्ट ।
दया-धर्म का नाश कर, जुआ दिलाता कष्ट ॥
939
रोटी कपड़ा संपदा, विद्या औ’ सम्मान ।
पाँचों नहिं उनके यहाँ, जिन्हें जुए की बान ॥
940
खोते खोते धन सभी, यथा जुएँ में मोह ।
सहते सहते दुःख भी, है जीने में मोह ॥
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