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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Sat Aug 16, 2008 1:14 pm |
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अध्याय 89. अन्तवैंर
881
छाया, जल भी हैं बुरे, जब करते हैं हानि ।
स्वजन-भाव भी हैं बुरे, यदि देते हैं ग्लानि ॥
882
डरना मत उस शत्रु से, जो है खड्ग समान ।
डर उस रिपु के मेल से, जो है मित्र समान ॥
883
बचना अन्त: शत्रु से, उनके खा कर त्रास ।
मिट्टी-छेदक ज्यों करें, थका देख वे नाश ॥
884
मन में बिना लगाव के, यदि हो अन्तवैंर ।
बन्धु-भेद-कारक कई, करता है वह गैर ॥
885
यदि होता बन्धुत्व में, कोई अन्तवैंर ।
मृत्युजनक जो सो कई, करता है वह गैर ॥
886
आश्रित लोगों से निजी, यदि होता है वैर ।
सदा असंभव तो रहा, बचना नाश-बगैर ॥
887
डब्बा-ढक्कन योग सम, रहने पर भी मेल ।
गृह में अन्तवैंर हो, तो होगा नहिं मेल ॥
888
रेती से घिस कर यथा, लोहा होता क्षीण ।
गृह भी अन्तवैंर से, होता है बलहीन ॥
889
अति छोटा ही क्यों न हो, तिल में यथा दरार ।
फिर भी अन्तवैंर तो, है ही विनाशकार ॥
890
जिनसे मन मिलता नहीं, जीवन उनके संग ।
एक झोंपड़ी में यथा, रहना सहित भुजंग ॥
अध्याय 90. बड़ों का उपचार न करना
891
सक्षम की करना नहीं, क्षमता का अपमान ।
रक्षा हित जो कार्य हैं, उनमें यही महान ॥
892
आदर न कर महान का, करे अगर व्यवहार ।
होगा उसे महान से, दारुण दुःख अपार ॥
893
करने की सामर्थ्य है, जब चाहें तब नाश ।
उनका अपचारी बनो, यदि चाहो निज नाश ॥
894
करना जो असमर्थ का, समर्थ का नुक़सान ।
है वह यम को हाथ से, करना ज्यों आह्वान ॥
895
जो पराक्रमी भूप के, बना कोप का पात्र ।
बच कर रह सकता कहाँ, कहीं न रक्षा मात्र ॥
896
जल जाने पर आग से, बचना संभव जान ।
बचता नहीं महान का, जो करता अपमान ॥
897
तप:श्रेष्ठ हैं जो महा, यदि करते हैं कोप ।
क्या हो धन संपत्ति की, और विभव की ओप ॥
898
जो महान हैं अचल सम, करते अगर विचार ।
जग में शाश्वत सम धनी, मिटता सह परिवार ॥
899
उत्तम व्रतधारी अगर, होते हैं नाराज ।
मिट जायेगा इन्द्र भी, गँवा बीच में राज ॥
900
तप:श्रेष्ठ यदि क्रुद्ध हों, रखते बडा प्रभाव ।
रखते बड़े सहाय भी, होता नहीं बचाव ॥
अध्याय 91. स्त्री-वश होना
901
स्त्री पर जो आसक्त हैं, उनको मिले न धर्म ।
अर्थार्थी के हित रहा, घृणित वस्तु वह कर्म ॥
902
स्त्री लोलुप की संपदा, वह है पौरुष-त्यक्त ।
लज्जास्पद बन कर बड़ी, लज्जित करती सख्त ॥
903
डरने की जो बान है, स्त्री से दब कर नीच ।
सदा रही लज्जाजनक, भले जनों के बीच ॥
904
गृहिणी से डर है जिसे, औ’ न मोक्ष की सिद्धि ।
उसकी कर्म-विदग्धता, पाती नहीं प्रसिद्धि ॥
905
पत्नी-भीरु सदा डरे, करने से वह कार्य ।
सज्जन लोगों के लिये, जो होते सत्कार्य ॥
906
जो डरते स्त्री-स्कंध से, जो है बाँस समान ।
यद्यपि रहते देव सम, उनका है नहिं मान ॥
907
स्त्री की आज्ञा पालता, जो पौरुष निर्लज्ज ॥
उससे बढ कर श्रेष्ठ है, स्त्री का स्त्रीत्व सलज्ज ॥
908
चारु मुखी वंछित वही, करते हैं जो कर्म ।
भरते कमी न मित्र की, करते नहीं सुधर्म ॥
909
धर्म-कर्म औ’ प्रचुर धन, तथा अन्य जो काम ।
स्त्री के आज्ञापाल को, इनका नहिं अंजाम ॥
910
जिनका मन हो कर्मरत, औ’ जो हों धनवान ।
स्त्री-वशिता से उन्हें, कभी न है अज्ञान ॥
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