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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Sat Aug 16, 2008 1:05 pm |
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अध्याय 86. विभेद
851
सब जीवों में फूट ही, कहते हैं बुध लोग ।
अनमिल-भाव-अनर्थ का, पोषण करता रोग ॥
852
कोई अनमिल भाव से, कर्म करे यदि पोच ।
अहित न करना है भला, भेद-भाव को सोच ॥
853
रहता है दुःखद बड़ा, भेद-भाव का रोग ।
उसके वर्जन से मिले, अमर कीर्तिका भोग ॥
854
दुःखों में सबसे बड़ा, है विभेद का दुःख ।
जब होता है नष्ट वह, होता सुख ही सुक्ख ॥
855
उठते देख विभेद को, हट कर रहे समर्थ ।
उसपर कौन समर्थ जो, सोचे जय के अर्थ ॥
856
भेद-वृद्धि से मानता, मिलता है आनन्द ।
जीवन उसका चूक कर, होगा नष्ट तुरन्त ॥
857
करते जो दुर्बुद्धि हैं, भेद-भाव से प्रति ।
तत्व-दर्श उनको नहीं, जो देता है जीत ॥
858
हट कर रहना भेद से, देता है संपत्ति ।
उससे अड़ कर जीतना, लाता पास विपत्ति ॥
859
भेद-भाव नहिं देखता, तो होती संपत्ति ।
अधिक देखना है उसे, पाना है आपत्ति ॥
860
होती हैं सब हानियाँ, भेद-भाव से प्राप्त ।
मैत्री से शुभ नीति का, उत्तम धन है प्राप्त ॥
अध्याय 87. शत्रुता-उत्कर्ष
861
बलवानों से मत भिड़ो, करके उनसे वैर ।
कमज़ोरों की शत्रुता, सदा चाहना ख़ैर ॥
862
प्रेम रहित निज बल रहित, सबल सहाय न पास ।
कर सकता है किस तरह, शत्रु शक्ति का नाश ॥
863
अनमिल है कंजूस है, कायर और अजान ।
उसपर जय पाना रहा, रिपु को अति आसान ॥
864
क्रोधी हो फिर हृदय से, जो दे भेद निकाल ।
उसपर जय सबको सुलभ, सब थल में, सब काल ॥
865
नीतिशास्त्र जो ना पढे, विधिवत् करे न काम ।
दुर्जन निंदा-भय-रहित, रिपु हित है सुख-धाम ॥
866
जो रहता क्रोधान्ध है, कामी भी अत्यन्त ।
है उसका शत्रुत्व तो, वांछनीय सानन्द ॥
867
करके कार्यारम्भ जो, करता फिर प्रतिकूल ।
निश्चय उसकी शत्रुता, करना दे भी मूल ॥
868
गुणविहीन रहते हुए, यदि हैं भी बहुदोष ।
तो है वह साथी रहित, रिपु को है संतोष ॥
869
यदि वैरी कायर तथा, नीतिशास्त्र अज्ञात ।
उनसे भिड़ते, उच्च सुख, छोड़ेंगे नहिं साथ ॥
870
अनपढ़ की कर शत्रुता, लघुता से जय-लाभ ।
पाने में असमर्थ जो, उसे नहीं यश-लाभ ॥
अध्याय 88. सत्रु-शक्ति का ज्ञान
871
रिपुता नामक है वही, असभ्यता-अवगाह ।
हँसी-मज़े में भी मनुज, उसकी करे न चाह ॥
872
धनु-हल-धारी कृषक से, करो भले ही वैर ।
वाणी-हल-धर कृषक से, करना छोड़ो वैर ॥
873
एकाकी रह जो करे, बहुत जनों से वैर ।
पागल से बढ़ कर रहा, बुद्धिहीन वह, खैर ॥
874
मित्र बना कर शत्रु को, जो करता व्यवहार ।
महिमा पर उस सभ्य की, टिकता है संसार ॥
875
अपना तो साथी नहीं, रिपु हैं दो, खुद एक ।
तो उनमें से ले बना, उचित सहायक एक ॥
876
पूर्व-ज्ञात हो परख कर, अथवा हा अज्ञात् ।
नाश-काल में छोड़ दो, शत्रु-मित्रता बात ॥
877
दुःख न कह उस मित्र से, यदि खुद उसे न ज्ञात ।
प्रकट न करना शत्रु से, कमज़ोरी की बात ॥
878
ढ़ंग समझ कर कर्म का, निज बल को कर चंड ।
अपनी रक्षा यदि करे, रिपु का मिटे घमंड ॥
879
जब पौधा है काटना, जो तरु कांटेदार ।
बढ़ने पर घायल करे, छेदक का कर दार ॥
880
जो रिपुओं के दर्प का, कर सकते नहिं नाश ।
निश्चय रिपु के फूँकते, होता उनका नाश ॥
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