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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Sat Aug 09, 2008 3:44 pm |
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अध्याय 83. कपट-मैत्री
821
अंतरंग मैत्री नहीं, पर केवल बहिरंग ।
अवसर पा वह पीटती, पकड़ निहाई ढ़ंग ।
822
बन्धु सदृश पर बन्धु नहिं, उनकी मैत्री-बान ।
है परिवर्तनशील ही, नारी-चित्त समान ॥
823
सद्ग्रंथों का अध्ययन, यद्यपि किया अनेक ।
शत्रु कभी होंगे नहीं, स्नेह-मना सविवेक ॥
824
मुख पर मधुर हँसी सहित, हृदय वैर से पूर ।
ऐसे लोगों से डरो, ये हैं वंचक कूर ॥
825
जिससे मन मिलता नहीं, उसका सुन वच मात्र ।
किसी विषय में मत समझ, उसे भरोसा पात्र ॥
826
यद्यपि बोलें मित्र सम, हितकर वचन गढ़ंत ।
शत्रु-वचन की व्यर्थता, होती प्रकट तुरंत ॥
827
सूचक है आपत्ति का, धनुष नमन की बान ।
सो रिपु-वचन-विनम्रता, निज हितकर मत जान ॥
828
जुड़े हाथ में शत्रु के, छिप रहता हथियार ।
वैसी ही रिपु की रही, रुदन-अश्रु-जल-धार ॥
829
जो अति मैत्री प्रकट कर, मन में करता हास ।
खुश कर मैत्री भाव से, करना उसका नाश ॥
830
शत्रु, मित्र जैसा बने, जब आवे यह काल ।
मुख पर मैत्री प्रकट कर, मन से उसे निकाल ॥
अध्याय 84. मूढ़ता
831
किसको कहना मूढ़ता, जो है दारुण दाग ।
हानिप्रद को ग्रहण कर, लाभप्रद का त्याग ॥
832
परम मूढ़ता मूढ़ में, जानो उसे प्रसिद्ध ।
उन सब में आसक्ति हो, जो हैं कर्म निषिद्ध ॥
833
निर्दयता, निर्लज्जता, निर्विचार का भाव ।
पोषण भी नहिं पोष्य का, ये हैं मूढ़ स्वभाव ॥
834
शास्त्रों का कर अध्यपन, अर्थ जानते गूढ़ ।
शिक्षक भी, पर नहिं वशी, उनसे बडा न मूढ़ ॥
835
सात जन्म जो यातना, मिले नरक के गर्त्त ।
मूढ़ एक ही में बना, लेने में सुसमर्थ ॥
836
प्रविधि-ज्ञान बिन मूढ़ यदि, शुरू करेगा काम ।
वह पहनेगा हथकड़ी, बिगड़ेगा ही काम ॥
837
जम जाये तो प्रचुर धन, अगर मूढ़ के पास ।
भोग करेंगे अन्य जन, परिजन तो उपवास ॥
838
लगना है संपत्ति का, एक मूढ़ के हस्त ।
पागल का होना यथा, ताड़ी पी कर मस्त ॥
839
पीड़ा तो देती नहीं, जब होती है भंग ।
सो मूढ़ों की मित्रता, है अति मधुर प्रसंग ॥
840
सुधी-सभा में मूढ़ का, घुसना है यों, ख़ैर ।
ज्यों रखना धोये बिना, स्वच्छ सेज पर पैर ॥
अध्याय 85. अहम्मन्य-मूढ़ता
841
सबसे बुरा अभाव है, सद्बुद्धि का अभाव ।
दुनिया अन्य अभाव को, नहिं मानती अभाव ॥
842
बुद्धिहीन नर हृदय से, करता है यदि दान ।
प्रातिग्राही का सुकृत वह, और नहीं कुछ जान ॥
843
जितनी पीड़ा मूढ़ नर, निज को देता आप ।
रिपु को भी संभव नहीं, देना उतना ताप ॥
844
हीन-बुद्धि किसको कहें, यदि पूछोगे बात ।
स्वयं मान ‘हम हैं सुधी’, भ्रम में पड़ना ज्ञात ॥
845
अपठित में ज्यों पठित का, व्यंजित करना भाव ।
सुपठित में भी दोष बिन, जनमे संशय-भाध ॥
846
मिटा न कर निज दोष को, गोपन कर अज्ञान ।
ढकना पट से गुहय को, अल्प बुद्धि की बान ॥
847
प्रकट करे मतिहीन जो, अति सहस्य की बात ।
अपने पर खुद ही बड़ा, कर लेगा आघात ॥
848
समझाने पर ना करे, और न समझे आप ।
मरण समय तक जीव वह, रहा रोग-अभिशाप ॥
849
समझाते नासमझ को, रहे नासमझ आप ।
समझदार सा नासमझ, स्वयं दिखेगा आप ॥
850
जग जिसके अस्तित्व को, ‘है’ कह लेता मान ।
जो न मानता वह रहा, जग में प्रेत समान ॥
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