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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Mon Jul 21, 2008 9:32 pm |
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अध्याय 80. मैत्री की परख
791
जाँचे बिन मैत्री सदृश, हानि नहीं है अन्य ।
मित्र बना तो छूट नहीं, जिसमें वह सौजन्य ॥
792
परख परख कर जो नहीं, किया गया सौहार्द ।
मरण दिलाता अन्त में, यों, करता वह आर्त ॥
793
गुण को कुल को दोष को, जितने बन्धु अनल्प ।
उन सब को भी परख कर, कर मैत्री का कल्प ॥
794
जो लज्जित बदनाम से, रहते हैं कुलवान ।
कर लो उनकी मित्रता, कर भी मूल्य-प्रदान ॥
795
झिड़की दे कर या रुला, समझावे व्यवहार ।
ऐसे समर्थ को परख, मैत्री कर स्वीकार ॥
796
होने पर भी विपद के, बड़ा लाभ है एक ।
मित्र-खेत सब मापता, मान-दंड वह एक ॥
797
मूर्खों के सौहार्द से, बच कर तजना साफ़ ।
इसको ही नर के लिये, कहा गया है लाभ ॥
798
ऐसे कर्म न सोचिये, जिनसे घटे उमंग ।
मित्र न हो जो दुख में, छोड़ जायगा संग ॥
799
विपद समय जो बन्धु जन, साथ छोड़ दें आप ।
मरण समय भी वह स्मरण, दिल को देगा ताप ॥
800
निर्मल चरित्रवान की, मैत्री लेना जोड़ ।
कुछ दे सही अयोग्य की, मैत्री देना छोड़ ॥
अध्याय 81. चिर-मैत्री
801
जो कुछ भी अधिकार से, करते हैं जन इष्ट ।
तिरस्कार बिन मानना, मैत्री कहो धनिष्ठ ॥
802
हक्र से करना कार्य है, मैत्री का ही अंग ।
फ़र्ज़ समझ सज्जन उसे, मानें सहित उमंग ॥
803
निज कृत सम जो मित्र का, साधिकार कृत काम ।
यदि स्वीकृत होता नहीं, चिर-मैत्री क्या काम ॥
804
पूछे बिन हक मान कर, मित्र करे यदि कार्य ।
वांछनीय गुण के लिये, मानें वह स्वीकार्य ॥
805
दुःखजनक यदि कार्य हैं, करते मित्र सुजान ।
अति हक़ या अज्ञान से, यों करते हैं जान ॥
806
चिरपरिचित घन मित्र से, यद्यपि हुआ अनिष्ट ।
मर्यादी छोडें नहीं, वह मित्रता धनिष्ठ ॥
807
स्नेही स्नेह-परंपरा, जो करते निर्वाह ।
मित्र करे यदि हानि भी, तज़ें न उसकी चाह ॥
808
मित्र-दोष को ना सुनें, ऐसे मित्र धनिष्ठ ।
मानें उस दिन को सफल, दोष करें जब इष्ट ॥
809
अविच्छिन्न चिर-मित्रता, जो रखते हैं यार ।
उनका स्नेह तजें न जो, उन्हें करे जग प्यार ॥
810
मैत्री का गुण पालते, चिरपरिचित का स्नेह ।
जो न तजें उस सुजन से, करें शत्रु भी स्नेह ॥
अध्याय 82. बुरी मैत्री
811
यद्यपि अतिशय मित्र सम, दिखते हैं गुणहीन ।
बढ़ने से वह मित्रता, अच्छा यदि हो क्षीण ॥
812
पा या खो कर क्या हुआ, अयोग्य का सौहार्द ।
जो मैत्री कर स्वार्थवश, तज दे जब नहिं स्वार्थ ॥
813
मित्र बने जो गणन कर, स्वार्थ-लाभ का मान ।
धन-गाहक गणिका तथा, चोर एक सा जान ॥
814
अनभ्यस्त हय युद्ध में, पटक चले ज्यों भाग ।
ऐसों के सौहार्द से, एकाकी बड़भाग ॥
815
तुच्छ मित्रता विपद में, जो देती न सहाय ।
ना होने में है भला, होने से भी, हाय ॥
816
अति धनिष्ठ बन मूर्ख का, हो जाने से इष्ट ।
समझदार की शत्रुता, लाखों गुणा वरिष्ठ ॥
817
हास्य-रसिक की मित्रता, करने से भी प्राप्त ।
भले बनें दस कोटि गुण, रिपु से जो हों प्राप्त ॥
818
यों असाध्य कह साध्य को, जो करता न सहाय ।
चुपके से उस ढोंग की, मैत्री छोड़ी जाय ॥
819
कहना कुछ करना अलग, जिनकी है यह बान ।
उनकी मैत्री खायगी, सपने में भी जान ॥
820
घर पर मैत्री पालते, सभा-मध्य धिक्कार ।
जो करते वे तनिक भी, निकट न आवें, यार ॥
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