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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Sun Jul 20, 2008 10:22 pm |
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[b]अध्याय 74. राष्ट्र
731
अक्षय उपज सुयोग्य जन, ह्रासहीन धनवान ।
मिल कर रहते हैं जहाँ, है वह राष्ट्र महान ॥
732
अति धन से कमनीय बन, नाशहीनता युक्त ।
प्रचुर उपज होती जहाँ, राष्ट्र वही है उक्त ॥
733
एक साथ जब आ पड़ें, तब भी सह सब भार ।
देता जो राजस्व सब, है वह राष्ट्र अपार ॥
734
भूख अपार न है जहाँ, रोग निरंतर है न ।
और न नाशक शत्रु भी, श्रेष्ठ राष्ट्र की सैन ॥
735
होते नहीं, विभिन्न दल, नाशक अंतर-वैर ।
नृप-कंटक खूनी नहीं, वही राष्ट्र है, ख़ैर ॥
736
नाश न होता, यदि हुआ, तो भी उपज यथेष्ट ।
जिसमें कम होती नहीं, वह राष्ट्रों में श्रेष्ठ ॥
737
कूप सरोवर नद-नदी, इनके पानी संग ।
सुस्थित पर्वत सुदृढ़ गढ़, बनते राष्ट्र-सुअंग ॥
738
प्रचुर उपज, नीरोगता, प्रसन्नता, ऐश्वर्य ।
और सुरक्षा, पाँच हैं, राष्ट्र-अलंकृति वर्य ॥
739
राष्ट्र वही जिसकी उपज, होती है बिन यत्न ।
राष्ट्र नहीं वह यदि उपज, होती है कर यत्न ॥
740
उपर्युक्त साधन सभी, होते हुए अपार ।
प्रजा-भूप-सद्भाव बिन, राष्ट्र रहा बेकार ॥
अध्याय 75. दुर्ग
741
आक्रामक को दुर्ग है, साधन महत्वपूर्ण ।
शरणार्थी-रक्षक वही, जो रिपु-भय से चूर्ण ॥
742
मणि सम जल, मरु भूमि औ’, जंगल घना पहाड़ ।
कहलाता है दुर्ग वह, जब हो इनसे आड़ ॥
743
उँचा, चौड़ा और दृढ़, अगम्य भी अत्यंत ।
चारों गुणयुत दुर्ग है, यों कहते हैं ग्रन्थ ॥
744
अति विस्तृत होते हुए, रक्षणीय थल तंग ।
दुर्ग वही जो शत्रु का, करता नष्ट उमंग ॥
745
जो रहता दुर्जेय है, रखता यथेष्ट अन्न ।
अंतरस्थ टिकते सुलभ, दुर्ग वही संपन्न ॥
746
कहलाता है दुर्ग वह, जो रख सभी पदार्थ ।
देता संकट काल में, योग्य वीर रक्षार्थ ॥
747
पिल पड़ कर या घेर कर, या करके छलछिद्र ।
जिसको हथिया ना सके, है वह दुर्ग विचित्र ॥
748
दुर्ग वही यदि चतुर रिपु, घेरा डालें घोर ।
अंतरस्थ डट कर लडें, पावें जय बरज़ोर ॥
749
शत्रु-नाश हो युद्ध में, ऐसे शस्त्र प्रयोग ।
करने के साधन जहाँ, है गढ़ वही अमोघ ॥
750
गढ़-रक्षक रण-कार्य में, यदि हैं नहीं समर्थ ।
अत्युत्तम गढ़ क्यों न हो, होता है वह व्यर्थ ॥
अध्याय 76. वित्त-साधन-विधि
751
धन जो देता है बना, नगण्य को भी गण्य ।
उसे छोड़ कर मनुज को, गण्य वस्तु नहिं अन्य ॥
752
निर्धन लोगो का सभी, करते हैं अपमान ।
धनवनों का तो सभी, करते हैं सम्मन ॥
753
धनरूपी दीपक अमर, देता हुआ प्रकाश ।
मनचाहा सब देश चल, करता है नम-नाश ॥
754
पाप-मार्ग को छोड़कर, न्याय रीति को जान ।
अर्जित धन है सुखद औ’, करता धर्म प्रदान ॥
755
दया और प्रिय भाव से, प्राप्त नहीं जो वित्त ।
जाने दो उस लाभ को, जमे न उसपर चित्त ॥
756
धन जिसका वारिस नहीं, धन चूँगी से प्राप्त ।
विजित शत्रु का भेंट-धन, धन हैं नृप हित आप्त ॥
757
जन्माता है प्रेम जो, दयारूप शिशु सुष्ट ।
पालित हो धन-धाय से, होता है बह पुष्ट ॥
758
निज धन रखते हाथ में, करना कोई कार्य ।
गिरि पर चढ़ गज-समर का, ईक्षण सदृश विचार्य ॥
759
शत्रु-गर्व को चिरने, तेज शास्त्र जो सिद्ध ।
धन से बढ़ कर है नहीं, सो संग्रह कर वित्त ॥
760
धर्म, काम दोनों सुलभ, मिलते हैं इक साथ ।
न्यायार्जित धन प्रचुर हो, लगता जिसके हाथ ॥[/b]
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