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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Sun Jul 20, 2008 10:15 pm |
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[/b[b] अध्याय 71. भावज्ञता
701
बिना कहे जो जान ले, मुख-मुद्रा से भाव ।
सदा रहा वह भूमि का, भूषण महानुभाव ॥
702
बिना किसी संदेह के, हृदयस्थित सब बात ।
जो जाने मानो उसे, देव तुल्य साक्षात ॥
703
मनोभाव मुख-भाव से, जो जानता निहार ।
अंगों में कुछ भी दिला, करो उसे स्वीकार ॥
704
बिना कहे भावज्ञ हैं, उनके सम भी लोग ।
आकृति में तो हैं मगर, रहें भिन्न वे लोग ॥
705
यदि नहिं जाना भाव को, मुख-मुद्रा अवलोक ।
अंगों में से आँख का, क्या होगा उपयोग ॥
706
बिम्बित करता स्फटिक ज्यों, निकट वस्तु का रंग ।
मन के अतिशय भाव को, मुख करता बहिरंग ॥
707
मुख से बढ़ कर बोधयुत, है क्या वस्तु विशेष ।
पहले वह बिम्बित करे, प्रसन्नता या द्वेष ॥
708
बीती समझे देखकर, यदि ऐसा नर प्राप्त ।
अभिमुख उसके हो खड़े, रहना है पर्याप्त ॥
709
बतलायेंगे नेत्र ही, शत्रु-मित्र का भाव ।
अगर मिलें जो जानते, दृग का भिन्न स्वभाव ॥
710
जो कहते हैं, ‘हम रहे’, सूक्ष्म बुद्धि से धन्य ।
मान-दण्ड उनका रहा, केवल नेत्र, न अन्य ॥
अध्याय 72. सभा-ज्ञान
711
शब्द-शक्ति के ज्ञानयुत, जो हैं पावन लोग ।
समझ सभा को, सोच कर, करना शब्द-प्रयोग ॥
712
शब्दों की शैली समझ, जिनको है अधिकार ।
सभासदों का देख रुख़, बोलें स्पष्ट प्रकार ॥
713
उद्यत हो जो बोलने, सभा-प्रकृति से अज्ञ ।
भाषण में असमर्थ वे, शब्द-रीति से अज्ञ ॥
714
प्राज्ञों के सम्मुख रहो, तुम भी प्राज्ञ सुजान ।
मूर्खों के सम्मुख बनो, चून सफेद समान ॥
715
भले गुणों में है भला, ज्ञानी गुरुजन मध्य ।
आगे बढ़ बोलें नहीं, ऐसा संयम पथ्य ॥
716
विद्वानों के सामने, जिनका विस्तृत ज्ञान ।
जो पा गया कलंक, वह, योग-भ्रष्ट समान ॥
717
निपुण पारखी शब्द के, जो हैं, उनके पास ।
विद्वत्ता शास्त्रज्ञ की, पाती खूब प्रकाश ॥
718
बुद्धिमान के सामने, जो बोलता सुजान ।
क्यारी बढ़ती फसल की, यथा सींचना जान ॥
719
सज्जन-मण्डल में करें, जो प्रभावकर बात ।
मूर्ख-सभा में भूल भी, करें न कोई बात ॥
720
यथा उँडेला अमृत है, आंगन में अपवित्र ।
भाषण देना है वहाँ, जहाँ न गण हैं मित्र ॥
अध्याय 73. सभा में निर्भीकता
721
शब्द शक्ति के ज्ञानयुत, जो जन हैं निर्दोष ।
प्राज्ञ-सभा में ढब समझ, करें न शब्द सदोष ॥
722
जो प्रभावकर ढ़ंग से, आर्जित शास्त्र-ज्ञान ।
प्रगटे विज्ञ-समझ, वह, विज्ञों में विद्वान ॥
723
शत्रु-मध्य मरते निडर, मिलते सुलभ अनेक ।
सभा-मध्य भाषण निडर, करते दुर्लभ एक ॥
724
विज्ञ-मध्य स्वज्ञान की, कर प्रभावकर बात ।
अपने से भी विज्ञ से, सीखो विशेष बात ॥
725
सभा-मध्य निर्भीक हो, उत्तर देने ठीक ।
शब्द-शास्त्र, फिर ध्यान से, तर्क-शास्त्र भी सीख ॥
726
निडर नहीं हैं जो उन्हें, खाँडे से क्या काम ।
सभा-भीरु जो हैं उन्हें, पोथी से क्या काम ॥
727
सभा-भीरु को प्राप्त है, जो भी शास्त्र-ज्ञान ।
कायर-कर रण-भूमि में, तीक्षण खड्ग समान ॥
728
रह कर भी बहु शास्त्रविद, है ही नहिं उपयोग ।
विज्ञ-सभा पर असर कर, कह न सके जो लोग ॥
729
जो होते भयभीत हैं, विज्ञ-सभा के बीच ।
रखते शास्त्रज्ञान भी, अनपढ़ से हैं नीच ॥
730
जो प्रभावकर ढ़ंग से, कह न सका निज ज्ञान ।
सभा-भीरु वह मृतक सम, यद्यपि है सप्राण ॥
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