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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Sat Jul 19, 2008 12:53 am |
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अध्याय 70. राजा से योग्य व्यवहार
691
दूर न पास न रह यथा, तापों उसी प्रकार ।
भाव-बदलते भूप से, करना है व्यवहार ॥
692
राजा को जो प्रिय रहें, उनकी हो नहिं चाह ।
उससे स्थायी संपदा, दिलायगा नरनाह ॥
693
यदि बचना है तो बचो, दोषों से विकराल ।
समाधान सभव नहीं, शक करते नरपाल ॥
694
कानाफूसी साथ ही, हँसी अन्य के साथ ।
महाराज के साथ में, छोड़ो इनका साथ ॥
695
छिपे सुनो मत भेद को, पूछो मत 'क्या बात' ।
प्रकट करे यदि नृप स्वयं, तो सुन लो वह बात ॥
696
भाव समझ समयज्ञ हो, छोड़ घृणित सब बात ।
नृप-मनचाहा ढंग से, कह आवश्यक बात ॥
697
नृप से वांछित बात कह, मगर निरर्थक बात ।
पूछें तो भी बिन कहे, सदा त्याग वह बात ॥
698
‘छोटे हैं, ये बन्धु हैं’, यों नहिं कर अपमान ।
किया जाय नरपाल का, देव तुल्य सम्मान ॥
699
‘नृप के प्रिय हम बन गये’, ऐसा कर सुविचार ।
जो हैं निश्चल बुद्धि के, करें न अप्रिय कार ॥
700
‘चिरपरिचित हैं’, यों समझ, नृप से दुर्व्यवहार ।
करने का अधिकार तो, करता हानि अपार ॥
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