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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Sat Jul 19, 2008 12:40 am |
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[b]अध्याय 67. कर्म में दृढ़ता
661
दृढ़ रहना ही कर्म में, मन की दृढ़ता जान ।
दृढ़ता कहलाती नहीं, जो है दृढ़ता आन ॥
662
दुष्ट न करना, यदि हुआ, तो फिर न हो अधीर ।
मत यह है नीतिज्ञ का, दो पथ मानें मीर ॥
663
प्रकट किया कर्मान्त में, तो है योग्य सुधीर ।
प्रकट किया यदि बीच में, देगा अनन्त पीर ॥
664
कहना तो सब के लिये, रहता है आसान ।
करना जो जैसा कहे, है दुस्साध्य निदान ॥
665
कीर्ति दिला कर सचित को, कर्म-निष्ठता-बान ।
नृप पर डाल प्रभाव वह, पावेगी सम्मान ॥
666
संकल्पित सब वस्तुएँ, यथा किया संकल्प ।
संकल्पक का जायगा, यदि वह दृढ़-संकल्प ॥
667
तिरस्कार करना नहीं, छोटा क़द अवलोक ।
चलते भारी यान में, अक्ष-आणि सम लोग ॥
668
सोच समझ निश्चय किया, करने का जो कर्म ।
हिचके बिन अविलम्ब ही, कर देना वह कर्म ॥
669
यद्यपि होगा बहुत दुख, दृढ़ता से काम ।
सुख-फल दायक ही रहा, जिसका शुभ परिणाम ॥
670
अन्य विषय में सदृढ़ता, रखते सचिव सुजान ।
यदि दृढ़ता नहिं कर्म की, जग न करेगा मान ॥
अध्याय 68. कर्म करने की रीति
671
निश्चय कर लेना रहा, विचार का परिणाम ।
हानि करेगा देर से, रुकना निश्चित काम ॥
672
जो विलम्ब के योग्य है, करो उसे सविलम्ब ।
जो होना अविलम्ब ही, करो उसे अविलम्ब ॥
673
जहाँ जहाँ वश चल सके, भलाकार्य हो जाय ।
वश न चले तो कीजिये, संभव देख उपाय ॥
674
कर्म-शेष रखना तथा, शत्रु जनों में शर्म-शेष रखना तथा,
अग्नि-शेष सम ही करें, दोनों हानि विशेष ॥
675
धन साधन अवसर तथा, स्थान व निश्चित कर्म ।
पाँचों पर भ्रम के बिना, विचार कर कर कर्म ॥
676
साधन में श्रम, विघ्न भी, पूरा हो जब कर्म ।
प्राप लाभ कितना बड़ा, देख इन्हें कर कर्म ॥
677
विधि है कर्मी को यही, जब करता है कर्म ।
उसके अति मर्मज्ञ से, ग्रहण करे वह मर्म ॥
678
एक कर्म करते हुए, और कर्म हो जाय ।
मद गज से मद-मत्त गज, जैसे पकड़ा जाय ॥
679
करने से हित कार्य भी, मित्रों के उपयुक्त ।
शत्रु जनों को शीघ्र ही, मित्र बनाना युक्त ॥
680
भीति समझकर स्वजन की, मंत्री जो कमज़ोर ।
संधि करेंगे नमन कर, रिपु यदि है बरज़ोर ॥
अध्याय 69. दूत
681
स्नेहशीलता उच्चकुल, नृप-इच्छित आचार ।
राज-दूत में चाहिये, यह उत्तम संस्कार ॥
682
प्रेम बुद्धिमानी तथा, वाक्शक्ति सविवेक ।
ये तीनों अनिवार्य हैं, राजदूत को एक ॥
683
रिपु-नृप से जा जो करे, निज नृप की जय-बात ।
लक्षण उसका वह रहे, विज्ञों में विख्यात ॥
684
दूत कार्य हित वह चले, जिसके रहें अधीन ।
शिक्षा अनुसंधानयुत, बुद्धि, रूप ये तीन ॥
685
पुरुष वचन को त्याग कर, करे समन्वित बात ।
लाभ करे प्रिय बोल कर, वही दूत है ज्ञात ॥
686
नीति सीख हर, हो निडर, कर प्रभावकर बात ।
समयोचित जो जान ले, वही दूत है ज्ञात ॥
687
स्थान समय कर्तव्य भी, इनका कर सुविचार ।
बात करे जो सोच कर, उत्तम दूत निहार ॥
688
शुद्ध आचरण संग-बल, तथा धैर्य ये तीन ।
इनके ऊपर सत्यता, लक्षण दूत प्रवीण ॥
689
नृप को जो संदेशवह, यों हो वह गुण-सिद्ध ।
भूल चूक भी निंद्य वच, कहे न वह दृढ़-चित्त ॥
690
चाहे हो प्राणान्त भी, निज नृप का गुण-गान ।
करता जो भय के बिना, दूत उसी को जान ॥[/b]
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