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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Fri Jul 18, 2008 7:57 pm |
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अध्याय 64. अमात्य
631
साधन, काल, उपाय औ’, कार्यसिद्धि दुस्साध्य ।
इनका श्रेष्ठ विधान जो, करता वही अमात्य ॥
632
दृढ़ता, कुल-रक्षण तथा, यत्न, सुशिक्षा, ज्ञान ।
पाँच गुणों से युक्त जो, वही अमात्य सुजान ॥
633
फूट डालना शत्रु में, पालन मैत्री-भाव ।
लेना बिछुड़ों को मिला, योग्य आमात्य-स्वभाव ॥
634
विश्लेषण करता तथा, परख कार्य को साध्य ।
दृढ़ता पूर्वक मंत्रणा, देता योग्य अमात्य ॥
635
धर्म जान, संयम सहित, ज्ञानपूर्ण कर बात ।
सदा समझता शक्ति को, साथी है वह ख्यात ॥
636
शास्त्र जानते जो रहा, सूक्ष्म बुद्धि का भौन ।
उसका करते सामना, सूक्ष्म प्रश्न अति कौन ॥
637
यद्यपि विधियों का रहा, शास्त्र रीति से ज्ञान ।
फिर भी करना चाहिये, लोकरीति को जान ॥
638
हत्या कर उपदेश की, खुद हो अज्ञ नरेश ।
फिर भी धर्म अमात्य का, देना दृढ़ उपदेश ॥
639
हानि विचारे निकट रह, यदि दुर्मंत्री एक ।
उससे सत्तर कोटि रिपु, मानों बढ़ कर नेक ॥
640
यद्यपि क्रम से सोच कर, शुरू करे सब कर्म ।
जिनमें दृढ़ क्षमता नहीं, करें अधूरा कर्म ॥
अध्याय 66. कर्म-शुद्धि
651
साथी की परिशुद्धता, दे देती है प्रेय ।
कर्मों की परिशुद्धता, देती है सब श्रेय ॥
652
सदा त्यागना चाहिये, जो हैं ऐसे कर्म ।
कीर्ति-लाभ के साथ जो, देते हैं नहिं धर्म ॥
653
‘उन्नति करनी चाहिये’, यों जिनको हो राग ।
निज गौरव को हानिकर, करें कर्म वे त्याग ॥
654
यद्यपि संकट-ग्रस्त हों, जिनका निश्चल ज्ञान ।
निंद्य कर्म फिर भी सुधी, नहीं करेंगे जान ॥
655
जिससे पश्चात्ताप हो, करो न ऐसा कार्य ।
अगर किया तो फिर भला, ना कर ऐसा कार्य ॥
656
जननी को भूखी सही, यद्यपि देखा जाय ।
सज्जन-निन्दित कार्य को, तो भी किया न जाय ॥
657
दोष वहन कर प्राप्त जो, सज्जन को ऐश्वर्य ।
उससे अति दारिद्रय ही, सहना उसको वर्य ॥
658
वर्ज किये बिन वर्ज्य सब, जो करता दुष्कर्म ।
कार्य-पूर्ति ही क्यों न हो, पीड़ा दें वे कर्म ॥
659
रुला अन्य को प्राप्त सब, रुला उसे वह जाय ।
खो कर भी सत्संपदा, पीछे फल दे जाय ॥
660
छल से धन को जोड़ कर, रखने की तदबीर ।
कच्चे मिट्टी कलश में, भर रखना ज्यों नीर ॥
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