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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Thu Jul 17, 2008 7:02 am |
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अध्याय 61. आलस्यहीनता
601
जब तम से आलस्य के, आच्छादित हो जाय ।
अक्षय दीप कुटुंब का, मंद मंद बुझ जाय ॥
602
जो चाहें निज वंश का, बना रहे उत्कर्ष ।
नाश करें आलस्य का, करते उसका धर्ष ॥
603
गोद लिये आलस्य को, जो जड़ करे विलास ।
होगा उसके पूर्व ही, जात-वंश का नाश ॥
604
जो सुस्ती में मग्न हों, यत्न बिना सुविशेष ।
तो उनका कुल नष्ट हो, बढ़ें दोष निःशेष ॥
605
दीर्घसूत्रता, विस्मरण, सुस्ती, निद्रा-चाव ।
जो जन चाहें डूबना, चारों हैं प्रिय नाव ॥
606
सार्वभौम की श्री स्वयं, चाहे आवे पास ।
तो भी जो हैं आलसी, पावें नहिं फल ख़ास ॥
607
सुस्ती-प्रिय बन, यत्न सुठि, करते नहिं जो लोग ।
डांट तथा उपहास भी, सुनते हैं वे लोग ॥
608
घर कर ले आलस्य यदि, रह कुलीन के पास ।
उसके रिपु के वश उसे, बनायगा वह दास ॥
609
सुस्ती-पालन बान का, कर देगा यदि अंत ।
वंश और पुरुषार्थ में, लगे दोष हों अंत ॥
610
क़दम बढ़ा कर विष्णु ने, जिसे किया था व्याप्त ।
वह सब आलसहीन नृप, करे एकदम प्राप्त ॥
अध्याय 62. उद्यमशीलता
611
दुष्कर यह यों समझकर, होना नहीं निरास ।
जानो योग्य महानता, देगा सतत प्रयास ॥
612
ढीला पड़ना यत्न में, कर दो बिलकुल त्याग ।
त्यागेंगे जो यत्न को, उन्हें करे जग त्याग ॥
613
यत्नशीलता जो रही, उत्तम गुणस्वरूप ।
उसपर स्थित है श्रेष्ठता, परोपकार स्वरूप ॥
614
यों है उद्यमरहित का, करना परोपकार ।
कोई कायर व्यर्थ ज्यों, चला रहा तलवार ॥
615
जिसे न सुख की चाह है, कर्म-पूर्ति है चाह ।
स्तंभ बने वह थामता, मिटा बन्धुजन-आह ॥
616
बढ़ती धन-संपत्ति की, कर देता है यत्न ।
दारिद्रय को घुसेड़ कर, देता रहे अयत्न ॥
617
करती है आलस्य में, काली ज्येष्ठा वास ।
यत्नशील के यत्न में, कमला का है वास ॥
618
यदि विधि नहिं अनुकूल है, तो न किसी का दोष ।
खूब जान ज्ञातव्य को, यत्न न करना दोष ॥
619
यद्यपि मिले न दैववश, इच्छित फल जो भोग्य ।
श्रम देगा पारिश्रमिक, निज देह-श्रम-योग्य ॥
620
विधि पर भी पाते विजय, जो हैं उद्यमशील ।
सतत यत्न करते हुए, बिना किये कुछ ढील ॥
अध्याय 63. संकट में अनाकुलता
621
जब दुख-संकट आ पड़े, तब करना उल्लास ।
तत्सम कोई ना करे, भिड़ कर उसका नाश ॥
622
जो आवेगा बाढ़ सा, बुद्धिमान को कष्ट ।
मनोधैर्य से सोचते, हो जावे वह नष्ट ॥
623
दुख-संकट जब आ पड़े, दुखी न हो जो लोग ।
दुख-संकट को दुख में, डालेंगे वे लोग ॥
624
ऊबट में भी खींचते, बैल सदृष जो जाय ।
उसपर जो दुख आ पड़े, उस दुख पर दुख आय ॥
625
दुख निरंतर हो रहा, फिर भी धैर्य न जाय ।
ऐसों को यदि दुख हुआ, उस दुख पर दुख आय ॥
626
धन पा कर, आग्रह सहित, जो नहिं करते लोभ ।
धन खो कर क्या खिन्न हो, कभी करेंगे क्षोभ ॥
627
देह दुख का लक्ष्य तो, होती है यों जान ।
क्षुब्ध न होते दुख से, जो हैं पुरुष महान ॥
628
विधिवश होता दुख है, यों जिसको है ज्ञान ।
तथा न सुख की चाह भी, दुखी न हो वह प्राण ॥
629
सुख में सुख की चाह से, जो न करेगा भोग ।
दुःखी होकर दुःख में, वह न करेगा शोक ॥
630
दुख को भी सुख सदृश ही, यदि ले कोई मान ।
तो उसको उपलब्ध हो, रिपु से मानित मान ॥
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