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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Fri Jul 04, 2008 12:27 am |
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अध्याय 58.दया-दृष्टि
571
करुणा रूपी सोहती, सुषमा रही अपार ।
नृप में उसके राजते, टिकता है संसार ॥
572
करुणा से है चल रहा, सांसारिक व्यवहार ।
जो नर उससे रहित है, केवल भू का भार ॥
573
मेल न हो तो गान से, तान करे क्या काम ।
दया न हो तो दृष्टि में, दृग आये क्या काम ॥
574
करुणा कलित नयन नहीं, समुचित सीमाबद्ध ।
तो क्या आवें काम वे, मुख से रह संबन्ध ॥
575
आभूषण है नेत्र का, करुणा का सद्भाव ।
उसके बिन जाने उसे, केवल मुख पर घाव ॥
576
रहने पर भी आँख के, जिसके है नहिं आँख ।
यथा ईख भू में लगी, जिसके भी हैं आँख ॥
577
आँखहीन ही हैं मनुज, यदि न आँख का भाव ।
आँखयुक्त में आँख का, होता भी न अभाव ॥
578
हानि बिना निज धर्म की, करुणा का व्यवहार ।
जो कर सकता है उसे, जग पर है अधिकार ॥
579
अपनी क्षति भी जो करे, उसपर करुणा-भाव ।
धारण कर, करना क्षमा, नृप का श्रेष्ठ स्वभाव ॥
580
देख मिलाते गरल भी, खा जाते वह भोग ।
वाँछनीय दाक्षिण्य के, इच्छुक हैं जो लोग ॥
अध्याय 59. गुप्तचर-व्यवस्था
581
जो अपने चर हैं तथा, नीतिशास्त्र विख्यात ।
ये दोनों निज नेत्र हैं, नृप को होना ज्ञात ॥
582
सब पर जो जो घटित हों, सब बातें सब काल ।
राजधर्म है जानना, चारों से तत्काल ॥
583
बात चरों से जानते, आशय का नहिं ज्ञान ।
तो उस नृप की विजय का, मार्ग नहीं है आन ॥
584
राजकर्मचारी, स्वजन, तथा शत्रु जो वाम ।
सब के सब को परखना, रहा गुप्तचर-काम ॥
585
रूप देख कर शक न हो, आँख हुई, निर्भीक ।
कहीं कहे नहिं मर्म को, सक्षम वह चर ठीक ॥
586
साधु वेष में घुस चले, पता लगाते मर्म ।
फिर कुछ भी हो चुप रहे, यही गुप्तचर-कर्म ॥
587
भेद लगाने में चतुर, फिर जो बातें ज्ञात ।
उनमें संशयरहित हो, वही भेदिया ख्यात ॥
588
पता लगा कर भेद का, लाया यदि इक चार ।
भेद लगा फिर अन्य से, तुलना कर स्वीकार ॥
589
चर चर को जाने नहीं, यों कर शासन-कर्म ।
सत्य मान, जब तीन चर, कहें एक सा मर्म ॥
590
खुले आम जासूस का, करना मत सम्मान ।
अगर किया तो भेद को, प्रकट किया खुद जान ॥
अध्याय 60. उत्साहयुक्तता
591
धनी कहाने योग्य है, यदि हो धन उत्साह ।
उसके बिन यदि अन्य धन, हो तो क्या परवाह ॥
592
एक स्वत्व उत्साह है, स्थायी स्वत्व ज़रूर ।
अस्थायी रह अन्य धन, हो जायेंगे दूर ॥
593
रहता जिनके हाथ में, उमंग का स्थिर वित्त ।
‘वित्त गया’ कहते हुए, ना हों अधीर-चित्त ॥
594
जिस उत्साही पुरुष का, अचल रहे उत्साह ।
वित्त चले उसके यहाँ, पूछ-ताछ कर राह ॥
595
जलज-नाल उतनी बड़ी, जितनी जल की थाह ।
नर होता उतना बड़ा, जितना हो उत्साह ॥
596
जो विचार मन में उठें, सब हों उच्च विचार ।
यद्यपि सिद्ध न उच्चता, विफल न वे सुविचार ॥
597
दुर्गति में भी उद्यमी, होते नहीं अधीर ।
घायल भी शर-राशि से, गज रहता है धीर ॥
598
‘हम तो हैं इस जगत में, दानी महा धुरीण’ ।
कर सकते नहिं गर्व यों, जो हैं जोश-विहीन ॥
599
यद्यपि विशालकाय है, तथा तेज़ हैं दांत ।
डरता है गज बाघ से, होने पर आक्रांत ॥
600
सच्ची शक्ति मनुष्य की, है उत्साह अपार ।
उसके बिन नर वृक्ष सम, केवल नर आकार ॥
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