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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Mon Jun 30, 2008 7:34 am |
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[b]अध्याय 51. परख कर विश्वास करना
501
धर्म-अर्थ औ’ काम से, मिला प्राण-भय चार ।
इन उपधाओं से परख, विश्वस्त है विचार ॥
502
जो कुलीन निर्दोष हो, निन्दा से भयभीत ।
तथा लजीला हो वही, विश्वस्त है पुनीत ॥
503
ज्ञाता विशिष्ट शास्त्र के, औ’ निर्दोष स्वभाव ।
फिर भी परखो तो उन्हें, नहिं अज्ञता-अभाव ॥
504
परख गुणों को फिर परख, दोषों को भी छान ।
उनमें बहुतायत परख, उससे कर पहचान ॥
505
महिमा या लघिमा सही, इनकी करने जाँच ।
नर के निज निज कर्म ही, बनें कसौटी साँच ॥
506
विश्वसनीय न मानिये, बन्धुहीन जो लोग ।
निन्दा से लज्जित न हैं, स्नेह शून्य वे लोग ॥
507
मूर्ख जनों पर प्रेमवश, जो करता विश्वास ।
सभी तरह से वह बने, जड़ता का आवास ।
508
परखे बिन अज्ञात पर, किया अगर विश्वास ।
संतित को चिरकाल तक, लेनी पड़े असाँस ॥
509
किसी व्यक्ति पर मत करो, परखे बिन विश्वास ।
बेशक सौंपो योग्य यद, करने पर विश्वास ॥
510
परखे बिन विश्वास भी, औ’ करके विश्वास ।
फिर करना सन्देह भी, देते हैं चिर नाश ॥
अध्याय 52. परख कर कार्य सौंपना
511
भले-बुरे को परख जो, करता भला पसंद ।
उसके योग्य नियुक्ति को, करना सही प्रबन्ध ॥
512
आय-वृद्धि-साधन बढ़ा, धन-वर्द्धक कर कार्य ।
विघ्न परख जो टालता, वही करे नृप-कार्य ॥
513
प्रेम, बुद्धि, दृढ़-चित्तता, निर्लोभता-सुनीति ।
चारों जिसमें पूर्ण हों, उसपर करो प्रतीति ॥
514
सभी तरह की परख से, योग्य दिखें जो लोग ।
उनमें कार्य निबाहते, विकृत बने बहु लोग ॥
515
जो करता है धैर्य से, खूब समझ सदुपाय ।
उसे छोड़ प्रिय बन्धु को, कार्य न सौंपा जाय ॥
516
कर्ता का लक्षण परख, परख कर्म की रीति ।
संयोजित कर काल से, सौंपों सहित प्रतीति ॥
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517
इस साधन से व्यक्ति यह, कर सकता यह कार्य ।
परिशीलन कर इस तरह, सौंप उसे वह कार्य ॥
518
यदि पाया इक व्यक्ति को, परख कार्य के योग्य ।
तो फिर उसे नियुक्त कर, पदवी देना योग्य ॥
519
तत्परता-वश कार्य में, हुआ मित्र व्यवहार ।
उसको समझे अन्यता, तो श्री जावे पार ॥
520
राज-भृत्य यदि विकृत नहिं, विकृत न होगा राज ।
रोज़ परखना चाहिये, नृप को उसका काज ॥
अध्याय 53. बन्धुओं को अपनाना
521
यद्यपि निर्धन हो गये, पहले कृत उपकार ।
कहते रहे बखान कर, केवल नातेदार ॥
522
बन्धु-वर्ग ऐसा मिले, जिसका प्रेम अटूट ।
तो वह दे संपत्ति सब , जिसकी वृद्धि अटूट ॥
523
मिलनसार जो है नहीं, जीवन उसका व्यर्थ ।
तट बिन विस्तृत ताल ज्यों, भरता जल से व्यर्थ ॥
524
अपने को पाया धनी, तो फल हो यह प्राप्त ।
बन्धु-मंडली घिर रहे, यों रहना बन आप्त ॥
525
मधुर वचन जो बोलता, करता भी है दान ।
बन्धुवर्ग के वर्ग से, घिरा रहेगा जान ॥
526
महादान करते हुए, जो है क्रोध-विमुक्त ।
उसके सम भू में नहीं, बन्धुवर्ग से युक्त ॥
5 27
बिना छिपाये काँव कर, कौआ खाता भोज्य ।
जो हैं उसी स्वभाव के, पाते हैं सब भोग्य ॥
528
सब को सम देखे नहीं, देखे क्षमता एक ।
इस गुण से स्थायी रहें, नृप के बन्धु अनेक ॥
529
बन्धु बने जो जन रहे, तोड़े यदि बन्धुत्व ।
अनबन का कारण मिटे, तो बनता बन्धुत्व ॥
530
कारण बिन जो बिछुड़ कर, लौटे कारण साथ ।
साध-पूर्ति कर नृप उसे, परख, मिला के साथ ॥[size=18][/size]
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