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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Thu Jun 26, 2008 5:21 am |
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अध्याय 44. दोष-निवारण
431
काम क्रोध मद दोष से, जो होते हैं मुक्त ।
उनकी जो बढ़ती हुई, होती महिमा-युक्त ॥
432
हाथ खींचना दान से, रखना मिथ्या मान ।
नृप का अति दाक्षिण्य भी, मानो दोष अमान ॥
433
निन्दा का डर है जोन्हें, तिलभर निज अपराध ।
होता तो बस ताड़ सम, मानें उसे अगाध ॥
434
बचकर रहना दोष से, लक्ष्य मान अत्यंत ।
परम शत्रु है दोष ही, जो कर देगा अंत ॥
435
दोष उपस्थिति पूर्व ही, किया न जीवन रक्ष ।
तो वह मिटता है यथा, भूसा अग्नि समक्ष ॥
436
दोष-मुक्त कर आपको, बाद पराया दाष ।
जो देखे उस भूप में, हो सकता क्या दोष ॥
437
जो धन में आसक्त है, बिना किये कर्तव्य ।
जमता उसके पास जो, व्यर्थ जाय वह द्रव्य ॥
438
धनासक्ति जो लोभ है, वह है दोष विशेश |
अन्तर्गत उनके नहीं, जितने दोष अशेष ॥
439
श्रेष्ठ समझ कर आपको, कभी न कर अभिमान ।
चाह न हो उस कर्म की, जो न करे कल्याण ॥
440
भोगेगा यदि गुप्त रख, मनचाहा सब काम ।
रिपुओं का षड्यंत्र तब, हो जावे बेकाम ॥
अध्याय 45. सत्संग-लाभ
441
ज्ञानवृद्ध जो बन गये, धर्म-सूक्ष्म को जान ।
मैत्री उनकी, ढ़ंग से, पा लो महत्व जान ॥
44 2
आगत दुःख निवार कर, भावी दुःख से त्राण ।
करते जो, अपना उन्हें, करके आदर-मान ॥
443
दुर्लभ सब में है यही, दुर्लभ भाग्य महान ।
स्वजन बनाना मान से, जो हैं पुरुष महान ॥
444
करना ऐसा आचरण, जिससे पुरुष महान ।
बन जावें आत्मीय जन, उत्तम बल यह जान ॥
445
आँख बना कर सचिव को, ढोता शासन-भार ।
सो नृप चुन ले सचिव को, करके सोच विचार ॥
446
योग्य जनों का बन्धु बन, करता जो व्यवहार ।
उसका कर सकते नहीं, शत्रु लोग अपकार ॥
447
दोष देख कर डाँटने जब हैं मित्र सुयोग्य ।
तब नृप का करने अहित, कौन शत्रु है योग्य ॥
448
डांट-डपटते मित्र की, रक्षा बिन नरकंत ।
शत्रु बिना भी हानिकर, पा जाता है अंत ॥
449
बिना मूलधन वणिक जन, पावेंगे नहिं लाभ ।
सहचर-आश्रय रहित नृप, करें न स्थिरता लाभ ॥
450
बहुत जनों की शत्रुता, करने में जो हानि ।
उससे बढ़ सत्संग को, तजने में है हानि ॥
अध्याय 46. कुसंग-वर्जन
451
ओछों से डरना रहा, उत्तम जन की बान ।
गले लगाना बन्धु सम, है ओछों की बान ॥
452
मिट्टी गुणानुसार ज्यों, बदले वारि-स्वभाव ।
संगति से त्यों मनुज का, बदले बुद्धि-स्वभाव ॥
453
मनोजन्य है मनुज का, प्राकृत इन्द्रियज्ञान ।
ऐसा यह यों नाम तो, संग-जन्य है जान ॥
454
मनोजन्य सा दीखता, भले बुरे का ज्ञान ।
संग-जन्य रहता मगर, नर का ऐसा ज्ञान ॥
455
मन की होना शुद्धता, तथा कर्म की शुद्धि ।
दोनों का अवलंब है, संगति की परिशुद्धि ॥
456
पातें सत्सन्तान हैं, जिनका है मन शुद्ध ।
विफल कर्म होता नहीं, जिनका रंग विशुद्ध ॥
457
मन की शुद्धि मनुष्य को, देती है ऐश्वर्य ।
सत्संगति तो फिर उसे, देती सब यश वर्य ॥
458
शुद्ध चित्तवाले स्वतः, रहते साधु महान ।
सत्संगति फिर भी उन्हें, करती शक्ति प्रदान ॥
459
चित्त-शुद्धि परलोक का, देती है आनन्द ।
वही शुद्धि सत्संग से होती और बुलन्द ॥
460
साथी कोई है नहीं, साध- संग से उच्च ।
बढ़ कर कुसंग से नहीं, शत्रु हानिकर तुच्छ ॥
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