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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Wed Jun 25, 2008 5:41 am |
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अध्याय 41. अशिक्षा
401
सभा-मध्य यों बोलना, बिना पढ़े सदग्रन्थ ।
है पासे का खेल ज्यों, बिन चौसर का बंध ॥
402
यों है अपढ़ मनुष्य की, भाषण-पटुता-चाह ।
ज्यों दोनों कुचरहित की, स्त्रीत्व-भोग की चाह ॥
403
अपढ़ लोग भी मानिये, उत्तम गुण का भौन ।
विद्वानों के सामने, यदि साधेंगे मौन ॥
404
बहुत श्रेष्ठ ही क्यों न हो, कभी मूर्ख का ज्ञान ।
विद्वज्जन का तो उसे, नहीं मिलेगा मान ॥
405
माने यदि कोई अपढ़, बुद्धिमान ही आप ।
मिटे भाव वह जब करें, बुध से वार्त्तालाप ॥
406
जीवित मात्र रहा अपढ़, और न कुछ वह, जान ।
उत्पादक जो ना रही, ऊसर भूमि समान ॥
407
सूक्ष्म बुद्धि जिसकी नहीं, प्रतिभा नहीं अनूप ।
मिट्टी की सुठि मूर्ति सम, उसका खिलता रूप ॥
408
शिक्षित के दारिद्रय से, करती अधिक विपत्ति ।
मूर्ख जनों के पास जो, जमी हुई संपत्ति ॥
409
उच्छ जाति का क्यों न हो, तो भी अपढ़ अजान ।
नीच किन्तु शिक्षित सदृश, पाता नहिं सम्मान ॥
410
नर से पशु की जो रहा, तुलना में अति भेद ।
अध्येत सद्ग्रन्थ के, तथा अपढ़ में भेद ॥
अध्याय 42. श्रवण
411
धन धन में तो श्रवण-धन, रहता अधिक प्रधान ।
सभी धनों में धन वही, पाता शीर्षस्थान ॥
412
कानों को जब ना मिले, श्रवण रूप रस पान ।
दिया जाय तब पेट को, कुछ भोजन का दान ॥
413
जिनके कानों को मिला, श्रवण रूप में भोग ।
हवि के भोजी देव सम, भुवि में हैं वे लोग ॥
414
यद्यपि शिक्षित है नहीं, करे श्रवण सविवेक ।
क्लांत दशा में वह उसे, देगा सहाय टेक ॥
415
फिसलन पर चलते हुए, ज्यों लाठी की टेक ।
त्यों हैं, चरित्रवान के, मूँह के वच सविवेक ॥
416
श्रवण करो सद्विषय का, जितना ही हो अल्प ।
अल्प श्रवण भी तो तुम्हें, देगा मान अनल्प ॥
417
जो जन अनुसंधान कर, रहें बहु-श्रुत साथ ।
यद्यपि भूलें मोहवश, करें न जड़ की बात ॥
418
श्रवण श्रवण करके भला, छिद न गये जो कान ।
श्रवण-शक्ति रखते हुए, बहरे कान समान ॥
419
जिन लोगों को है नहीं, सूक्ष्म श्रवण का ज्ञान ।
नम्र वचन भी बोलना, उनको दुष्कर जान ॥
420
जो जाने बिन श्रवण रस, रखता जिह्वा-स्वाद ।
चाहे जीये या मरे, उससे सुख न विषाद ॥
अध्याय 43. बुद्धिमत्ता
421
रक्षा हित कै नाश से, बुद्धिरूप औजार ।
है भी रिपुओं के लिये, दुर्गम दुर्ग आपार ॥
422
मनमाना जाने न दे, पाप-मार्ग से थाम ।
मन को लाना सुपथ पर, रहा बुद्धि का काम ॥
423
चाहे जिससे भी सुनें, कोई भी हो बात ।
तत्व-बोध उस बात का, बुद्धि युक्तता ज्ञात ॥
424
कह प्रभावकर ढंग से, सुगम बना स्वविचार ।
सुधी समझता अन्य के, सूक्ष्म कथन का सार ॥
425
मैत्री उत्तम जगत की, करते हैं धीमान ।
खिल कर सकुचाती नहीं, सुधी-मित्रता बान ॥
426
जैसा लोकाचार है, उसके ही उपयुक्त ।
जो करना है आचारण, वही सुधी के युक्त ॥
427
बुद्धिमान वे हैं जिन्हें, है भविष्य का ज्ञान ।
बुद्धिहीन वे हैं जिन्हें, प्राप्त नहीं वह ज्ञान ॥
428
निर्भयता भेतव्य से, है जड़ता का नाम ।
भय रखना भेतव्य से, रहा सुधी का काम ॥
429
जो भावी को जान कर, रक्षा करता आप ।
दुःख न दे उस प्राज्ञ को, भयकारी संताप ॥
430
सब धन से संपन्न हैं, जो होते मतिमान ।
चाहे सब कुछ क्यों न हो, मूर्ख दरिद्र समान ॥
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