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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Sun Jun 22, 2008 7:08 am |
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अध्याय 37. तृष्णा का उ़न्मूलन
361
सर्व जीव को सर्वदा, तृष्णा-बीज अचूक ।
पैदा करता है वही, जन्म-मरण की हूक ॥
362
जन्म-नाश की चाह हो, यदि होनी है चाह ।
चाह-नाश की चाह से, पूरी हो वह चाह ॥
363
तृष्णा-त्याग सदृश नहीं, यहाँ श्रेष्ठ धन-धाम ।
स्वर्ग-धाम में भी नहीं, उसके सम धन-धाम ॥
364
चाह गई तो है वही, पवित्रता या मुक्ति ।
करो सत्य की चाह तो, होगी चाह-विमुक्ति ॥
365
कहलाते वे मुक्त हैं, जो हैं तृष्णा-मुक्त ।
सब प्रकार से, अन्य सब, उतने नहीं विमुक्त ॥
366
तृष्णा से डरते बचे, है यह धर्म महान ।
न तो फँसाये जाल में, पा कर असावधान ॥
367
तृष्णा को यदि कर दिया, पूरा नष्ट समूल ।
धर्म-कर्म सब आ मिले, इच्छा के अनुकूल ॥
368
तृष्णा-त्यागी को कभी, होगा ही नहिं दुःख ।
तृष्णा के वश यदि पड़े, होगा दुःख पर दुःख ॥
369
तृष्णा का यदि नाश हो, जो है दुःख कराल ।
इस जीवन में भी मनुज, पावे सुख चिरकाल ॥
370
तृष्णा को त्यागो अगर, जिसकी कभी न तुष्टि ।
वही दशा दे मुक्ति जो, रही सदा सन्तुष्टि ॥
अध्याय 38. प्रारब्ध
371
अर्थ-वृद्धि के भाग्य से, हो आलस्य-अभाव ।
अर्थ-नाश के भाग्य से, हो आलस्य स्वभाव ॥
372
अर्थ-क्षयकर भाग्य तो, करे बुद्धि को मन्द ।
अर्थ-वृद्धिकर भाग्य तो, करे विशाल अमन्द ॥
373
गूढ़ शास्त्र सीखें बहुत, फिर भी अपना भाग्य ।
मन्द बुद्धि का हो अगर, हावी मांद्य अभाग्य ॥
374
जगत-प्रकृति है नियतिवश, दो प्रकार से भिन्न ।
श्रीयुत होना एक है, ज्ञान-प्राप्ति है भिन्न ॥
375
धन अर्जन करत समय, विधिवश यह हो जाय ।
बुरा बनेगा सब भला, बुरा भला बन जाय ॥
376
कठिन यत्न भी ना रखे, जो न रहा निज भाग ।
निकाले नहीं निकलता, जो है अपने भाग ॥
377
भाग्य-विद्यायक के किये, बिना भाग्य का योग ।
कोटि चयन के बाद भी, दुर्लभ है सुख-भोग ॥
378
दुःख बदे जो हैं उन्हें, यदि न दिलावें दैव ।
सुख से वंचित दीन सब, बनें विरक्त तदैव ॥
379
रमता है सुख-भोग में, फल दे जब सत्कर्म ।
गड़बड़ करना किसलिये, फल दे जब दुष्कर्म ॥
380
बढ़ कर भी प्रारब्ध से, क्या है शक्ति महान ।
जयी वही उसपर अगर, चाल चलावे आन ॥
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