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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Fri Jun 20, 2008 2:51 pm |
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े, कर्मअध्याय 34. अनित्यता
331
जो है अनित्य वस्तुएँ, नित्य वस्तु सम भाव ।
अल्पबुद्धिवश जो रहा, है यह नीच स्वभाव ॥
332
रंग-भूमि में ज्यो जमे, दर्शक गण की भीड़ ।
जुड़े प्रचुर संपत्ति त्यों, छँटे यथा वह भीड़ ॥
333
धन की प्रकृति अनित्य है, यदि पावे ऐश्वर्य ।
तो करना तत्काल ही, नित्य धर्म सब वर्य ॥
334
काल-मान सम भासता, दिन है आरी-दांत ।
सोचो तो वह आयु को, चीर रहा दुर्दान्त ॥
335
जीभ बंद हो, हिचकियाँ लगने से ही पूर्व ।
चटपट करना चाहिये, जो है कर्म अपूर्व ॥
336
कल जो था, बस, आज तो, प्राप्त किया पंचत्व ।
पाया है संसार ने, ऐसा बड़ा महत्व ॥
337
अगले क्षण क्या जी रहें, इसका है नहिं बोध ।
चिंतन कोटिन, अनगिनत, करते रहें अबोध ॥
338
अंडा फूट हुआ अलग, तो पंछी उड़ जाय ।
वैसा देही-देह का, नाता जाना जाय ॥
339
निद्रा सम ही जानिये, होता है देहान्त ।
जगना सम है जनन फिर, निद्रा के उपरान्त ॥
340
आत्मा का क्या है नहीं, कोई स्थायी धाम ।
सो तो रहती देह में, भाड़े का सा धाम ॥
अध्याय 35. संन्यास
341
ज्यों ज्यों मिटती जायगी, जिस जिसमें आसक्ति ।
त्यों त्यों तद्गत दुःख से, मुक्त हो रहा व्यक्ति ॥
342
संन्यासी यदि बन गया, यहीं कई आनन्द ।
संन्यासी बन समय पर, यदि होना आनन्द ॥
343
दृढ़ता से करना दमन, पंचेन्द्रियगत राग ।
उनके प्रेरक वस्तु सब, करो एकदम त्याग ॥
344
सर्वसंग का त्याग ही, तप का है गुण-मूल ।
बन्धन फिर तप भंग कर, बने अविद्या-मूल ॥
345
भव- बन्धन को काटते, बोझा ही है देह ।
फिर औरों से तो कहो, क्यों संबन्ध- सनेह ॥
346
अहंकार ममकार को, जिसने किया समाप्त ।
देवों को अप्राप्य भी, लोक करेगा प्राप्त ॥
347
अनासक्त जो न हुए, पर हैं अति आसक्त ।
उनको लिपटें दुःख सब, और करें नहिं त्यक्त ॥
348
पूर्ण त्याग से पा चुके, मोक्ष- धाम वे धन्य ।
भव- बाधा के जाल में, फँसें मोह- वश अन्य ॥
349
मिटते ही आसक्ति के, होगी भव से मुक्ति ।
बनी रहेगी अन्यथा, अनित्यता की भुक्ति ॥
350
वीतराग के राग में, हो तेरा अनुराग ।
सुदृढ़ उसी में रागना, जिससे पाय विराग ॥
अध्याय 36. तत्वज्ञान
351
मिथ्या में जब सत्य का, होता भ्रम से भान ।
देता है भव-दुःख को, भ्रममूलक वह ज्ञान ।
352
मोह-मुक्त हो पा गये, निर्मल तत्वज्ञान ।
भव-तम को वह दूर कर, दे आनन्द महान ॥
353
जिसने संशय-मुक्त हो, पाया ज्ञान-प्रदीप ।
उसको पृथ्वी से अधिक, रहता मोक्ष समीप ॥
354
वशीभूत मन हो गया, हुई धारणा सिद्ध ।
फिर भी तत्वज्ञान बिन, फल होगा नहिं सिद्ध ॥
355
किसी तरह भी क्यों नहीं, भासे अमुक पदार्थ ।
तथ्य-बोध उस वस्तु का, जानो ज्ञान पथार्थ ॥
356
जिसने पाया श्रवण से, यहीं तत्व का ज्ञान ।
मोक्ष-मार्ग में अग्रसर, होता वह धीमान ॥
357
उपदेशों को मनन कर, सत्य-बोध हो जाय ।
पुनर्जन्म की तो उन्हें, चिन्ता नहिं रह जाय ॥
358
जन्म-मूल अज्ञान है, उसके निवारणार्थ ।
मोक्ष-मूल परमार्थ का, दर्शन ज्ञान पथार्थ ॥
359
जगदाश्रय को समझ यदि, बनो स्वयं निर्लिप्त ।
नाशक भावी दुःख सब, करें कभी नहिं लिप्त ॥
360
काम क्रोध औ’ मोह का न हो नाम का योग ।
तीनों के मिटते, मिट-फलों का रोग ॥[b][/b]
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