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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Thu Jun 19, 2008 10:34 pm |
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अध्याय 31. अक्रोध
301
जहाँ चले वश क्रोध का, कर उसका अवरोध ।
अवश क्रोध का क्या किया, क्या न किया उपरोध ॥
302
वश न चले जब क्रोध का, तब है क्रोध खराब ।
अगर चले बश फिर वही, सबसे रहा खराब ॥
303
किसी व्यक्ति पर भी कभी, क्रोध न कर, जा भूल ।
क्योंकि अनर्थों का वही, क्रोध बनेगा मूल ॥
304
हास और उल्लास को, हनन करेगा क्रोध ।
उससे बढ़ कर कौन है, रिपु जो करे विरोध ॥
305
रक्षा हित अपनी स्वयं, बचो क्रोध से साफ़ ।
यदि न बचो तो क्रोध ही, तुम्हें करेगा साफ़ ॥
306
आश्रित जन का नाश जो, करे क्रोध की आग ।
इष्ट-बन्धु-जन-नाव को, जलायगी वह आग ॥
307
मान्य वस्तु सम क्रोध को, जो माने वह जाय ।
हाथ मार ज्यों भूमि पर, चोट से न बच जाय ॥
308
अग्निज्वाला जलन ज्यों, किया अनिष्ट यथेष्ट ।
फिर भी यदि संभव हुआ, क्रोध-दमन है श्रेष्ठ ॥
309
जो मन में नहिं लायगा, कभी क्रोध का ख्याल ।
मनचाही सब वस्तुएँ, उसे प्राप्य तत्काल ॥
310
जो होते अति क्रोधवश, हैं वे मृतक समान ।
त्यागी हैं जो क्रोध के, त्यक्त-मृत्यु सम मान ॥
अध्याय 32. अहिंसा
311
तप-प्राप्र धन भी मिले, फिर भी साधु-सुजान ।
हानि न करना अन्य की, मानें लक्ष्य महान ॥
312
बुरा किया यदि क्रोध से, फिर भी सधु-सुजान ।
ना करना प्रतिकार ही, मानें लक्ष्य महान ॥
313
‘बुरा किया कारण बिना’, करके यही विचार ।
किया अगर प्रतिकार तो, होगा दुःख अपार ॥
314
बुरा किया तो कर भला, बुरा भला फिर भूल ।
पानी पानी हो रहा, बस उसको यह शूल ॥
315
माने नहिं पर दुःख को, यदि निज दुःख समान ।
तो होता क्या लाभ है, रखते तत्वज्ञान ॥
316
कोई समझे जब स्वयं, बुरा फलाना कर्म ।
अन्यों पर उस कर्म को, नहीं करे, यह धर्म ॥
317
किसी व्यक्ति को उल्प भी, जो भी समय अनिष्ट ।
मनपूर्वक करना नहीं, सबसे यही वरिष्ठ ॥
318
जिससे अपना अहित हो, उसका है दृढ़ ज्ञान ।
फिर अन्यों का अहित क्यों, करता है नादान ॥
319
दिया सबेरे अन्य को, यदि तुमने संताप ।
वही ताप फिर साँझ को, तुमपर आवे आप ॥
320
जो दुःख देगा अन्य को, स्वयं करे दुःख-भोग ।
दुःख-वर्जन की चाह से, दुःख न दें बुध लोग ॥
अध्याय 33. वध-निशेध
321
धर्म-कृत्य का अर्थ है, प्राणी-वध का त्याग ।
प्राणी-हनन दिलायगा, सर्व-पाप-फल-भाग ॥
322
खाना बाँट क्षुधार्त्त को, पालन कर सब जीव ।
शास्त्रकार मत में यही, उत्तम नीति अतीव ॥
323
प्राणी-हनन निषेध का, अद्वितीय है स्थान ।
तदनन्तर ही श्रेष्ठ है, मिथ्या-वर्जन मान ॥
324
लक्षण क्या उस पंथ का, जिसको कहें सुपंथ ।
जीव-हनन वर्जन करे, जो पथ वही सुपंथ ॥
325
जीवन से भयभीत हो, जो होते हैं संत ।
वध-भय से वध त्याग दे, उनमें वही महंत ॥
326
हाथ उठावेगा नहीं जीवन-भक्षक काल ।
उस जीवन पर, जो रहें, वध-निषेध-व्रत-पाल ॥
327
प्राण-हानि अपनी हुई, तो भी हो निज धर्म ।
अन्यों के प्रिय प्राण का, करें न नाशक कर्म ॥
328
वध-मूलक धन प्राप्ति से, यद्यपि हो अति प्रेय ।
संत महात्मा को वही, धन निकृष्ट है ज्ञेय ॥
329
प्राणी-हत्या की जिन्हें, निकृष्टता का भान ।
उनके मत में वधिक जन, हैं चण्डाल मलान ॥
330
जीवन नीच दरिद्र हो, जिसका रुग्ण शरीर ।
कहते बुथ, उसने किया, प्राण-वियुक्त शरीर ॥
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