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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Thu Jun 12, 2008 1:09 am |
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अध्याय 28. मिथ्याचार
271
वंचक के आचार को, मिथ्यापूर्ण विलोक ।
पाँचों भूत शरीरगत, हँस दे मन में रोक ॥
272
उच्च गगन सम वेष तो, क्या आवेगा काम ।
समझ- बूंझ यदि मन करे, जो है दूषित काम ॥
273
महा साधु का वेष धर, दमन-शक्ति नहिं, हाय ।
व्याघ्र-चर्म आढे हुए, खेत चरे ज्यों गाय ॥
274
रहते तापस भेस में, करना पापाचार ।
झाड़-आड़ चिड़िहार ज्यों, पंछी पकड़े मार ॥
275
‘हूँ विरक्त’ कह जो मनुज, करता मिथ्याचार ।
कष्ट अनेकों हों उसे, स्वयं करे धिक्कार ॥
276
मोह-मुक्त मन तो नहीं, है निर्मम की बान ।
मिथ्याचारी के सदृश, निष्ठुर नहीं महान ॥
277
बाहर से है लालिमा, हैं घुंघची समान ।
उसका काला अग्र सम, अन्दर है अज्ञान ॥
278
नहा तीर्थ में ठाट से, रखते तापस भेस ।
मित्थ्याचारी हैं बहुत, हृदय शुद्ध नहिं लेश ॥
279
टेढ़ी वीणा है मधुर, सीधा तीर कठोर ।
वैसे ही कृति से परख, किसी साधु की कोर ॥
280
साधक ने यदि तज दिया, जग-निन्दित सब काम ।
उसको मुंडा या जटिल, बनना है बेकाम ॥
अध्याय 29. अस्तेय
281
निन्दित जीवन से अगर, इच्छा है बच जाय ।
चोरी से पर-वस्तु की, हृदय बचाया जाय ॥
282
चोरी से पर-संपदा, पाने का कुविचार ।
लाना भी मन में बुरा, है यह पापाचार ॥
283
चोरी-कृत धन में रहे, बढ़्ने का आभास ।
पर उसका सीमारहित, होता ही है नाश ॥
284
चोरी के प्रति लालसा, जो होती अत्यन्त ।
फल पोने के समय पर, देती दुःख अनन्त ॥
285
है गफलत की ताक में, पर-धन की है चाह ।
दयाशीलता प्रेम की, लोभ न पकड़े राह ॥
286
चौर्य-कर्म प्रति हैं जिन्हें, रहती अति आसक्ति ।
मर्यादा पर टिक उन्हें, चलने को नहिं शक्ति ॥
287
मर्यादा को पालते, जो रहते सज्ञान ।
उनमें होता है नहीं, चोरी का अज्ञान ॥
288
ज्यों मर्यादा-पाल के, मन में स्थिर है धर्म ।
त्यों प्रवंचना-पाल के, मन में वंचक कर्म ॥
289
जिन्हें चौर्य को छोड़ कर, औ’ न किसी का ज्ञान ।
मर्यादा बिन कर्म कर, मिटते तभी अजान ॥
290
चिरों को निज देह भी, ढकेल कर दे छोड़ ।
पालक को अस्तेय व्रत, स्वर्ग न देगा छोड़ ॥
अध्याय 30. सत्य
291
परिभाषा है सत्य की, वचन विनिर्गत हानि ।
सत्य-कथन से अल्प भी न हो किसी को ग्लानि ॥
292
मिथ्या-भाषण यदि करे, दोषरहित कल्याण ।
तो यह मिथ्या-कथन भी, मानो सत्य समान ॥
293
निज मन समझे जब स्वयं, झूठ न बोलें आप ।
बोलें तो फिर आप को, निज मन दे संताप ॥
294
मन से सत्याचरण का, जो करता अभ्यास ।
जग के सब के हृदय में, करता है वह वास ॥
295
दान-पुण्य तप-कर्म भी, करते हैं जो लोग ।
उनसे बढ़ हैं, हृदय से, सच बोलें जो लोग ॥
296
मिथ्या-भाषण त्याग सम, रहा न कीर्ति-विकास ।
उससे सारा धर्म-फल, पाये बिना प्रयास ॥
297
सत्य-धर्म का आचरण, सत्य-धर्म ही मान ।
अन्य धर्म सब त्यागना, अच्छा ही है जान ॥
298
बाह्य-शुद्धता देह को, देता ही है तोय ।
अन्तः करण-विशुद्धता, प्रकट सत्य से जोंय ॥
299
दीपक सब दीपक नहीं, जिनसे हो तम-नाश ।
सत्य-दीप ही दीप है, पावें साधु प्रकाश ॥
300
हमने अनुसन्धान से, जितने पाये तत्व ।
उनमें कोई सत्य सम, पाता नहीं महत्व ॥
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