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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Wed Jun 11, 2008 6:18 am |
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अध्याय 26. माँस- वर्जन
251
माँस-वृद्धि अपनी समझ, जो खाता पर माँस ।
कैसे दयार्द्रता-सुगुण, रहता उसके पास ॥
252
धन का भोग उन्हें नहीं, जो न करेंगे क्षेम ।
माँसाहारी को नहीं, दयालुता का नेम ॥
253
ज्यों सशस्त्र का मन कभी, होता नहीं दयाल ।
रुच रुच खावे माँस जो, उसके मन का हाल ॥
254
निर्दयता है जीववध. दया अहिंसा धर्म ।
करना माँसाहार है, धर्म हीन दुष्कर्म ॥
255
रक्षण है सब जीव का, वर्जन करना माँस ।
बचे नरक से वह नहीं, जो खाता है माँस ॥
256
वध न करेंगे लोग यदि, करने को आहार ।
आमिष लावेगा नहीं, कोई विक्रयकार ॥
257
आमिष तो इक जन्तु का, व्रण है यों सुविचार ।
यदि होगा तो चाहिए, तजना माँसाहार ॥
258
जीव-हनन से छिन्न जो, मृत शरीर है माँस ।
दोषरहित तत्वज्ञ तो, खायेंगे नहिं माँस ॥
259
यज्ञ हज़रों क्या किया, दे दे हवन यथेष्ट ।
किसी जीव को हनन कर, माँस न खाना श्रेष्ठ ॥
260
जो न करेगा जीव-वध, और न माँसाहार ।
हाथ जोड़ सारा जगत, करता उसे जुहार ॥
अध्याय 27. तप
261
तप नियमों को पालते, सहना कष्ट महान ।
जीव-हानि-वर्जन तथा, तप का यही निशान ॥
262
तप भी बस उनका रहा, जिनको है वह प्राप्त ।
यत्न वृथा उसके लिये, यदि हो वह अप्राप्त ॥
263
भोजनादि उपचार से, तपसी सेवा-धर्म ।
करने हित क्या अन्य सब, भूल गये तप-कर्म ॥
264
दुखदायी रिपु का दमन, प्रिय जन क उत्थान ।
स्मरण मात्र से हो सके, तप के बल अम्लान ॥
265
तप से सब कुछ प्राप्य हैं, जो चाहे जिस काल ।
इससे तप-साधन यहाँ, करना है तत्काल ॥
266
वही पुरुष कृतकृत्य है, जो करता तप-कर्म ।
करें कामवश अन्य सब, स्वहानिकारक कर्म ॥
267
तप तप कर ज्यों स्वर्ण की, होती निर्मल कान्ति ।
तपन ताप से ही तपी, चमक उठें उस भाँति ॥
268
आत्म-बोध जिनको हुआ, करके वश निज जीव ।
उनको करते वंदना, शेष जगत के जीव ॥
269
जिस तपसी को प्राप्त है, तप की शक्ति महान ।
यम पर भी उसकी विजय, संभव है तू जान ॥
270
निर्धन जन-गणना अधिक, इसका कौन निदान ।
तप नहिं करते बहुत जन, कम हैं तपोनिधान ॥
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