|
prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
|
Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
|
|
 |
Posted: Sun Jun 08, 2008 5:37 pm |
|
 |

|
 |
 |
[[size=18]b] अध्याय 24. कीर्ति
231
देना दान गरिब को, जीना कर यश-लाभ ।
इससे बढ़ कर जीव को, और नहीं है लाभ ॥
232
करता है संसार तो, उसका ही गुण-गान ।
याचक को जो दान में, कुछ भी करें प्रदान ॥
233
टिकती है संसार में, अनुपम कीर्ति महान ।
अविनाशी केवल वही, और न कोई जान ॥
234
यदि कोई भूलोक में, पाये कीर्ति महान ।
देवलोक तो ना करें, ज्ञानी का गुण-गान ॥
235
ह्रास बने यशवृद्धिकर, मृत्यु बने अमरत्व ।
ज्ञानवान बिन और में, संभव न यह महत्व ॥
236
जन्मा तो यों जन्म हो, जिसमें होवे नाम ।
जन्म न होना है भला, यदि न कमाया नाम ॥
237
कीर्तिमान बन ना जिया, कुढ़ता स्वयं न आप ।
निन्दक पर कुढ़ते हुए, क्यों होता है ताप ॥
238
यदि नहिं मिली परंपरा, जिसका है यश नाम ।
तो जग में सब के लिये, वही रहा अपनाम ॥
239
कीर्तिहीन की देह का, भू जब ढोती भार ।
पावन प्रभूत उपज का, क्षय होता निर्धार ॥
240
निन्दा बिन जो जी रहा, जीवित वही सुजान ।
कीर्ति बिना जो जी रहा, उसे मरा ही जान ॥
अध्याय 25. दयालुता
241
सर्व धनों में श्रेष्ठ है, दयारूप संपत्ति ।
नीच जनों के पास भी, है भौतिक संपत्ति ॥
242
सत्-पथ पर चल परख कर, दयाव्रती बन जाय ।
धर्म-विवेचन सकल कर, पाया वही सहाय ॥
243
अन्धकारमय नरक है, जहाँ न सुख लवलेश ।
दयापूर्ण का तो वहाँ, होता नहीं प्रवेश ॥
244
सब जीवों को पालते, दयाव्रती जो लोग ।
प्राण-भयंकर पाप का, उन्हें न होगा योग ॥
245
दुःख- दर्द उनको नहीं, जो है दयानिधान ।
पवन संचरित उर्वरा, महान भूमि प्रमाण ॥
246
जो निर्दय हैं पापरत, यों कहते धीमान ।
तज कर वे पुरुषार्थ को, भूले दुःख महान ॥
247
प्राप्य नहीं धनरहित को, ज्यों इहलौकिक भोग ।
प्राप्य नहीं परलोक का, दयारहित को योग ॥
248
निर्धन भी फूले-फले, स्यात् धनी बन जाय ।
निर्दय है निर्धन सदा, काया पलट न जाय ॥
249
निर्दय-जन-कृत सुकृत पर, अगर विचारा जाय ।
तत्व-दर्श ज्यों अज्ञ का, वह तो जाना जाय ॥
250
रोब जमाते निबल पर, निर्दय करे विचार ।
अपने से भी प्रभल के, सम्मुख खुद लाचार ॥[/b]
[/size]
|