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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Fri Jun 06, 2008 10:20 pm |
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[b][size=24] अध्याय 21. पाप-भीरुता
201
पाप-कर्म के मोह से, डरें न पापी लोग ।
उससे डरते हैं वही, पुण्य-पुरुष जो लोग ॥
202
पाप- कर्म दुखजनक हैं, यह है उनकी रीत ।
पावक से भीषण समझ, सो होना भयभीत ॥
203
श्रेष्ठ बुद्धिमत्ता कहें, करके सुधी विचार ।
अपने रिपु का भी कभी, नहिं करना अपकार ॥
204
विस्मृति से भी नर नहीं, सोचे पर की हानि ।
यदि सोचे तो धर्म भी, सोचे उसकी हानि ॥
205
‘निर्धन हूँ मैं’, यों समझ, करे न कोई पाप ।
अगर किया तो फिर मिले, निर्धनता-अभिशाप ॥
206
दुख से यदि दुष्कर्म के, बचने की है राय ।
अन्यों के प्रति दुष्टता, कभी नहीं की जाय ॥
207
अति भयकारी शत्रु से, संभव है बच जाय ।
पाप-कर्म की शत्रुता, पीछा किये सताय ॥
208
दुष्ट- कर्म जो भी करे, यों पायेगा नाश ।
छोड़े बिन पौरों तले, छाँह करे ज्यों वास ॥
209
कोई अपने आपको, यदि करता है प्यार ।
करे नहीं अत्यल्प भी, अन्यों का अपचार ॥
210
नाशरहित उसको समझ, जो तजकर सन्मार्ग ।
पाप-कर्म हो नहिं करे, पकड़े नहीं कुमार्ग ॥
अध्याय 22. लोकोपकारिता
211
उपकारी नहिं चाहते, पाना प्रत्युपकार ।
बादल को बदला भला, क्या देता संसार ॥
212
बहु प्रयत्न से जो जुड़ा, योग्य व्यक्ति के पास ।
लोगों के उपकार हित, है वह सब धन-रास ॥
213
किया भाव निष्काम से, जनोपकार समान ।
स्वर्ग तथा भू लोक में दुष्कर जान ॥
214
ज्ञाता शिष्टाचार का, है मनुष्य सप्राण ॥
मृत लोगों में अन्य की, गिनती होती जान ॥
215
पानी भरा तड़ाग ज्यों, आवे जग का काम ।
महा सुधी की संपदा, है जन-मन-सुख धाम ॥
216
शिष्ट जनों के पास यदि, आश्रित हो संपत्ति ।
ग्राम-मध्य ज्यों वृक्षवर, पावे फल-संपत्ति ॥
217
चूके बिन ज्यों वृक्ष का, दवा बने हर अंग ।
त्यों धन हो यदि वह रहे, उपकारी के संग ॥
218
सामाजिक कर्तव्य का, जिन सज्जन को ज्ञान ।
उपकृति से नहिं चूकते, दारिदवश भी जान ॥
219
उपकारी को है नहीं, दरिद्रता की सोच ।
‘मैं कृतकृत्य नहीं हुआ’ उसे यही संकोच ॥
220
लोकोपकारिता किये, यदि होगा ही नाश ।
अपने को भी बेच कर, क्रय-लायक वह नाश ॥
अध्याय 23. दान
221
देना दान गरीब को, है यथार्थ में दान ।
प्रत्याशा प्रतिदान की, है अन्य में निदान ॥
222
मोक्ष-मार्ग ही क्यों न हो, दान- ग्रहण अश्रेय ।
यद्यपि मोक्ष नहीं मिले, दान-धर्म ही श्रेय ॥
223
‘दीन-हीन हूँ’ ना कहे, करता है यों दान ।
केवल प्राप्य कुलीन में, ऐसी उत्तम बान ॥
224
याचित होने की दशा, तब तक रहे विषण्ण ।
जब तक याचक का वदन, होगा नहीं प्रसन्न ॥
225
क्षुधा-नियन्त्रण जो रहा, तपोनिष्ठ की शक्ति ।
क्षुधा-निवारक शक्ति के, पीछे ही वह शक्ति ॥
226
नाशक-भूक दरिद्र की, कर मिटा कर दूर ।
वह धनिकों को चयन हित, बनता कोष ज़रूर ॥
227
भोजन को जो बाँट कर, किया करेगा भोग ।
उसे नहीं पीड़ित करे, क्षुधा भयंकर रोग ॥
228
धन-संग्रह कर खो रहा, जो निर्दय धनवान ।
दे कर होते हर्ष का, क्या उसको नहिं ज्ञान ॥
229
स्वयं अकेले जीमना, पूर्ति के हेतु ।
याचन करने से अधिक, निश्चय दुख का हेतु ॥
230
मरने से बढ़ कर नहीं, दुख देने के अर्थ ।
सुखद वही जब दान में, देने को असम[/si[/b]ze]र्थ ॥
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