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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Wed Jun 04, 2008 11:31 pm |
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अध्याय 18. निर्लोभता
171
न्याय-बुद्धि को छोड़ कर, यदि हो पर-धन-लोभ ।
हो कर नाश कुटुम्ब का, होगा दोषारोप ॥
172
न्याय-पक्ष के त्याग से, जिनको होती लाज ।
लोभित पर-धन-लाभ से, करते नहीं अकाज ॥
173
नश्वर सुख के लोभ में, वे न करें दुष्कृत्य ।
जिनको इच्छा हो रही, पाने को सुख नित्य ॥
174
जो हैं इन्द्रियजित तथा, ज्ञानी भी अकलंक ।
दारिदवश भी लालची, होते नहीं अशंक ॥
175
तीखे विस्तृत ज्ञान से, क्या होगा उपकार ।
लालचवश सबसे करें, अनुचित व्यवहार ॥
176
ईश-कृपा की चाह से, जो न धर्म से भ्रष्ट ।
दुष्ट-कर्म धन-लोभ से, सोचे तो वह नष्ट ॥
177
चाहो मत संपत्ति को, लालच से उत्पन्न ।
उसका फल होता नहीं कभी सुगुण-संपन्न ॥
178
निज धन का क्षय हो नहीं, इसका क्या सदुपाय ।
अन्यों की संपत्ति का, लोभ किया नहिं जाय ॥
179
निर्लोभता ग्रहण करें, धर्म मान धीमान ।
श्री पहुँचे उनके यहाँ, युक्त काल थल जान ॥
180
अविचारी के लोभ से, होगा उसका अन्त ।
लोभ- हीनता- विभव से, होगी विजय अनन्त ॥
अध्याय 19. अपिशुनता
181
नाम न लेगा धर्म का, करे अधर्मिक काम ।
फिर भी अच्छा यदि वही, पाये अपिशुन नाम ॥
1 82
नास्तिवाद कर धर्म प्रति, करता पाप अखण्ड ।
उससे बदतर पिशुनता, सम्मुख हँस पाखण्ड ॥
183
चुगली खा कर क्या जिया, चापलूस हो साथ ।
भला, मृत्यु हो, तो लगे, शास्त्र- उक्त फल हाथ ॥
184
कोई मूँह पर ही कहे, यद्यपि निर्दय बात ।
कहो पीठ पीछे नहीं, जो न सुचिंतित बात ॥
185
प्रवचन-लीन सुधर्म के, हृदय धर्म से हीन ।
भण्डा इसका फोड़ दे, पैशुन्य ही मलीन ॥
186
परदूषक यदि तू बना, तुझमें हैं जो दोष ।
उनमें चुन सबसे बुरे, वह करता है घोष ॥
187
जो करते नहिं मित्रता, मधुर वचन हँस बोल ।
अलग करावें बन्धु को, परोक्ष में कटु बोल ॥
188
मित्रों के भी दोष का, घोषण जिनका धर्म ।
जाने अन्यों के प्रति, क्या क्या करें कुकर्म ॥
189
क्षमाशीलता धर्म है, यों करके सुविचार ।
क्या ढोती है भूमि भी, चुगलखोर का भार ॥
190
परछिद्रानवेषण सदृश, यदि देखे निज दोष ।
ति अविनाशी जीव का, क्यों हो दुख से शोष ॥
अध्याय 20. वृथालाप-निषेध
191
बहु जन सुन करते घृणा, यों जो करे प्रलाप ।
सर्व जनों का वह बने, उपहासास्पद आप ॥
192
बुद्धिमान जनवृन्द के, सम्मुख किया प्रलाप ।
अप्रिय करनी मित्र प्रति, करने से अति पाप ॥
193
लम्बी-चौड़ी बात जो, होती अर्थ-विहीन ।
घोषित करती है वही, वक्ता नीति-विहीन ॥
194
संस्कृत नहीं, निरर्थ हैं, सभा मध्य हैं उक्त ।
करते ऐसे शब्द हैं, सुगुण व नीति-वियुक्त ॥
195
निब्फल शब्द अगर कहे, कोई चरित्रवान ।
हो जावे उससे अलग, कीर्ति तथा सम्मान ॥
196
जिसको निब्फल शब्द में, रहती है आसक्ति ।
कह ना तू उसको मनुज, कहना थोथा व्यक्ति ॥
197
कहें भले ही साधुजन, कहीं अनय के शब्द ।
मगर इसी में है भला, कहें न निब्फल शब्द ॥
198
उत्तम फल की परख का, जिनमें होगा ज्ञान ।
महा प्रयोजन रहित वच, बोलेंगे नहिं जान ॥
199
तत्वज्ञानी पुरुष जो, माया-भ्रम से मुक्त ।
विस्मृति से भी ना कहें, वच जो अर्थ-वियुक्त ॥
200
कहना ऐसा शब्द ही, जिससे होवे लाभ ।
कहना मत ऐसा वचन, जिससे कुछ नहिं लाभ ॥
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