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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Sun Jun 01, 2008 7:21 am |
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अध्याय 16. क्षमाशीलता
151
क्षमा क्षमा कर ज्यों धरे, जो खोदेगा फोड़ ।
निन्दक को करना क्षमा, है सुधर्म बेजोड़ ॥
152
अच्छा है सब काल में, सहना अत्याचार ।
फिर तो उसको भूलना, उससे श्रेष्ठ विचार ॥
153
दारिद में दारिद्रय है, अतिथि-निवारण-बान ।
सहन मूर्ख की मूर्खता, बल में भी बल जान ॥
154
अगर सर्व-गुण-पूर्णता, तुमको छोड़ न जाय ।
क्षमा-भाव का आचरण, किया लगन से जाय ॥
155
प्रतिकारी को जगत तो, माने नहीं पदार्थ ।
क्षमशील को वह रखे, स्वर्ण समान पदार्थ ॥
156
प्रतिकारी का हो मज़ा, एक दिवस में अन्त ।
क्षमाशीला को कीर्ति है, लोक-अंत पर्यन्त ॥
157
यद्यपि कोई आपसे, करता अनुचित कर्म ।
अच्छा उस पर कर दया, करना नहीं अधर्म ॥
158
अहंकार से ज़्यादती, यदि तेरे विपरीत ।
करता कोई तो उसे, क्षमा-भाव से जीत ॥
159
संन्यासी से आधिक हैं, ऐसे गृही पवित्र ।
सहन करें जो नीच के, कटुक वचन अपवित्र ॥
160
0नशन हो जो तप करें, यद्यपि साधु महान ।
पर-कटुवचन-सहिष्णु के, पीछे पावें स्थान ॥
अध्याय 17. अनसूयता
161
जलन- रहित निज मन रहे ऐसी उत्तम बान ।
अपनावें हर एक नर, धर्म आचरण मान ॥
162
सबसे ऐसा भाव हो, जो है ईर्ष्या- मुक्त ।
तो उसके सम है नहीं, भाग्य श्रेष्ठता युक्त ॥
163
धर्म- अर्थ के लाभ की, जिसकी हैं नहीं चाह ।
पर-समृद्धि से खुश न हो, करता है वह डाह ॥
164
पाप- कर्म से हानियाँ, जो होती है जान ।
ईर्ष्यावश करते नहीं, पाप- कर्म धीमान ॥
165
शत्रु न भी हो ईर्ष्यु का, करने को कुछ हानि ।
जलन मात्र पर्याप्त है, करने को अति हानि ॥
166
दान देख कर जो जले, उसे सहित परिवार ।
रोटी कपडे को तरस, मिटते लगे न बार ॥
167
जलनेवाले से स्वयं, जल कर रमा अदीन ।
अपनी ज्येष्ठा के उसे , करती वही अधीन ॥
168
ईर्ष्या जो है पापिनी, करके श्री का नाश ।
नरक-अग्नि में झोंक कर, करती सत्यानास ॥
169
जब होती ईर्ष्यालु की, धन की वृद्धि अपार ।
तथा हानि भी साधु की, तो करना सुविचार ॥
170
सुख-समृद्धि उनकी नहीं, जो हों ईर्ष्यायुक्त ।
सुख-समृद्धि की इति नहीं, जो हों ईर्ष्यामुक्त ॥
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