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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Fri May 30, 2008 2:09 am |
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अध्याय 13. संयम्शीलता
121
संयम देता मनुज को, अमर लोक का वास ।
झोंक असंयम नरक में, करता सत्यानास ॥
122
संयम की रक्षा करो, निधि अनमोल समान ।
श्रेय नहीं है जीव को, उससे अधिक महान ॥
123
कोई संयमशील हो, अगर जानकर तत्व ।
संयम पा कर मान्यता, देगा उसे महत्व ॥
124
बिना टले निज धर्म से, जो हो संयमशील ।
पर्वत से भी उच्चतर, होगा उसका डील ॥
125
संयम उत्तम वस्तु है, जन के लिये अशेष ।
वह भी धनिकों में रहे, तो वह धन सुविशेष ॥
126
पंचेन्द्रिय-निग्राह किया, कछुआ सम इस जन्म ।
तो उससे रक्षा सुदृढ़, होगी सातों जन्म ॥
127
चाहे औरोंको नहीं, रख लें वश में जीभ ।
शब्द-दोष से हों दुखी, यदि न वशी हो जीभ ॥
128
एक बार भी कटुवचन, पहुँचाये यदि कष्ट ।
सत्कर्मों के सुफल सब, हो जायेंगे नष्ट ॥
129
घाव लगा जो आग से, संभव है भर जाय ।
चोट लगी यदि जीभ की, कभी न मोटी जाय ॥
130
क्रोध दमन कर जो हुआ, पंडित यमी समर्थ ।
धर्म-देव भी जोहता, बाट भेंट के अर्थ ॥
अध्याय 14. आचारशीलता
131
सदाचार-संपन्नता, देती सब को श्रेय ।
तब तो प्राणों से अधिक, रक्षणीय वह ज्ञेय ॥
132
सदाचार को यत्न से, रखना सहित विवेक ।
अनुशीलन से पायगा, वही सहायक एक ॥
133
सदाचार-संपन्नता, है कुलीनता जान ।
चूके यदि आचार से, नीच जन्म है मान ॥
134
संभव है फिर अध्ययन, भूल गया यदि वेद ।
आचारच्युत विप्र के, होगा कुल का छेद ॥
135
धन की ज्यों ईर्ष्यालु के, होती नहीं समृद्धि ।
आचारहीन की नहीं, कुलीनता की वृद्धि ॥
136
सदाचार दुष्कर समझ, धीर न खींचे हाथ ।
परिभव जो हो जान कर, उसकी च्युति के साथ ॥
137
सदाचार से ही रही, महा कीर्ति की प्राप्ति ।
उसकी च्युति से तो रही, आति निन्दा की प्राप्ति ॥
138
सदाचार के बीज से, होता सुख उत्पन्न ।
कदाचार से ही सदा, होता मनुज विपन्न ॥
139
सदाचारयुत लोग तो, मुख से कर भी भूल ।
कहने को असमर्थ हैं, बुरे वचन प्रतिकूल ॥
140
जिनको लोकाचार की, अनुगति का नहिं ज्ञान ।
ज्ञाता हों सब शास्त्र के, जानों उन्हें अजान ॥
अध्याय 15. परदार- विरति
141
परपत्नी-रति-मूढ़ता, है नहिं उनमें जान ।
धर्म-अर्थ के शास्त्र का, जिनको तत्वज्ञान ॥
142
धर्म-भ्रष्टों में नही, ऐसा कोई मूढ़ ।
जैसा अन्यद्वार पर, खड़ा रहा जो मूढ़ ॥
143
दृढ़ विश्वासी मित्र की, स्त्री से पापाचार ।
जो करता वो मृतक से, भिन्न नहीं है, यार ॥
144
क्या होगा उसको अहो, रखते विभव अनेक ।
यदि रति हो पर-दार में, तनिक न बुद्धि विवेक ॥
145
पर-पत्नी-रत जो हुआ, सुलभ समझ निश्शंक ।
लगे रहे चिर काल तक, उसपर अमिट कलंक ॥
146
पाप, शत्रुता, और भय, निन्दा मिल कर चार ।
ये उसको छोड़ें नहीं, जो करता व्यभिचार ॥
147
जो गृहस्थ पर-दार पर, होवे नहिं आसक्त ।
माना जाता है वही, धर्म-कर्म अनुरक्त ॥
148
पर-नारी नहिं ताकना, है धीरता महान ।
धर्म मात्र नहिं संत का, सदाचरण भी जान ॥
149
सागर-बलयित भूमि पर, कौन भोग्य के योग्य ।
आलिंगन पर- नारि को, जो न करे वह योग्य ॥
150
पाप- कर्म चाहे करें, धर्म मार्ग को छोड़ ।
पर-गृहिणी की विरति हो, तो वह गुण बेजोड़ ॥
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