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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Wed May 28, 2008 3:23 pm |
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THIRUKKURAL IN HINDI
तिरुक्कुरळ हिन्दी मे (तमिल से)
HINDI TRANSLATION BY: G.VENKATAKRISHNAN
Revised and enlarged Edition November, 1998.
Publisher:
Sakthi Finance Ltd.
Madras-600004.
तिरुक्कुरल के तीन भाग हैं- धर्म, अर्थ और काम । उनमें क्र्मशः 38, 70 और 25 अध्याय हैं । हर एक अध्याय में 10 ‘कुरल’ के हिसाब से समूचे ग्रंथ में 1330 ‘कुरल’ हैं । यह मुक्तक काव्य होने पर भी विषयों के प्रतिपादन में एक क्रम-बद्धता है और विषयों की व्यापकता विषय-सूची को देखने से ही ज्ञात हो सकती है । □□□□□
अध्याय 11. कृतज्ञता
101
उपकृत हुए बिना करे, यदि कोइ उपकार ।
दे कर भू सुर-लोक भी, मुक्त न हो आभार ॥
102
अति संकट के समय पर, किया गया उपकार ।
भू से अधिक महान है, यद्यपि अल्पाकार ॥
103
स्वार्थरहित कृत मदद का, यदि गुण आंका जाय ।
उदधि-बड़ाई से बड़ा, वह गुण माना जाय ॥
1 04
उपकृति तिल भर ही हुई, तो भी उसे सुजान ।
मानें ऊँचे ताड़ सम, सुफल इसी में जान ॥
105
सीमित नहिं, उपकार तक, प्रत्युपकार- प्रमाण ।
जितनी उपकृत-योग्यता, उतना उसका मान ॥
106
निर्दोषों की मित्रता, कभी न जाना भूल ।
आपद-बंधु स्नेह को, कभी न तजना भूल ॥
107
जिसने दुःख मिटा दिया, उसका स्नेह स्वभाव ।
सात जन्म तक भी स्मरण, करते महानुभाव ॥
108
भला नहीं है भूलना, जो भी हो उपकार ।
भला यही झट भूलना, कोई भी अपकार ॥
109
हत्या सम कोई करे, अगर बड़ी कुछ हानि ।
उसकी इक उपकार-स्मृति, करे हानि की हानि ॥
110
जो भी पातक नर करें, संभव है उद्धार ।
पर है नहीं कृतघ्न का, संभव ही निस्तार ॥
अध्याय 12. मध्यस्थता
111
मध्यस्थता यथेष्ट है, यदि हो यह संस्कार ।
शत्रु मित्र औ’ अन्य से, न्यायोचित व्यवहार ॥
112
न्यायनिष्ठ की संपदा, बिना हुए क्षयशील ।
वंश वंश का वह रहे, अवलंबन स्थितिशील ॥
113
तजने से निष्पक्षता, जो धन मिले अनन्त ।
भला, भले ही, वह करे तजना उसे तुरन्त ॥
114
कोई ईमान्दार है, अथवा बेईमान ।
उन उनके अवशेष से, होती यह पहचान ॥
115
संपन्नता विपन्नता, इनका है न अभाव ।
सज्जन का भूषण रहा, न्यायनिष्ठता भाव ॥
116
सर्वनाश मेरा हुआ, यों जाने निर्धार ।
चूक न्याय-पथ यदि हुआ, मन में बुरा विचार ॥
117
न्यायवान धर्मिष्ठ की, निर्धनता अवलोक ।
मानेगा नहिं हीनता, बुद्धिमान का लोक ॥
118
सम रेखा पर हो तुला, ज्यों तोले सामान ।
भूषण महानुभाव का, पक्ष न लेना मान ॥
119
कहना सीधा वचन है, मध्यस्थता ज़रूर ।
दृढ़ता से यदि हो गयी, चित्त-वक्रता दूर ॥
120
यदि रखते पर माल को, अपना माल समान ।
वणिक करे वाणीज्य तो, वही सही तू जान ॥
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