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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Mon May 26, 2008 4:28 am |
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अध्याय 10. मधुर-भाषण
मूँह से तत्वज्ञ के, हो कर निर्गत शब्द ।
प्रेम-सिक्त निष्कपट हैं, मधुर वचन वे शब्द ॥
92
मन प्रसन्न हो कर सही, करने से भी दान ।
मुख प्रसन्न भाषी मधुर, होना उत्तम मान ॥
93
ले कर मुख में सौम्यता, देखा भर प्रिय भाव ।
बिला हृद्गत मृदु वचन, यही धर्म का भाव ॥
94
दुख-वर्धक दारिद्र्य भी, छोड़ जायगा साथ ।
सुख-वर्धक प्रिय वचन यदि, बोले सब के साथ ॥
95
मृदुभाषी होना तथा, नम्र-भाव से युक्त ।
सच्चे भूषण मनुज के, अन्य नहीं है उक्त ॥
96
होगा ह्रास अधर्म का, सुधर्म का उत्थान ।
चुन चुन कर यदि शुभ वचन, कहे मधुरता-सान ॥
97
मधुर शब्द संस्कारयुत, पर को कर वरदान ।
वक्ता को नय-नीति दे, करता पुण्य प्रदान ॥
98
ओछापन से रहित जो, मीठा वचन प्रयोग ।
लोक तथा परलोक में, देता है सुख-भोग ॥
99
मधुर वचन का मधुर फल, जो भोगे खुद आप ।
कटुक वचन फिर क्यों कहे, जो देता संताप ॥
100
रहते सुमधुर वचन के, कटु कहने की बान ।
यों ही पक्का छोड़ फल, कच्चा ग्रहण समान ॥
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