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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Sun May 18, 2008 12:09 am |
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अध्याय 8. प्रेम-भाव
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अर्गल है क्या जो रखे, प्रेमी उर में प्यार ।
घोषण करती साफ़ ही, तुच्छ नयन-जल-धार ॥
72
प्रेम-शून्य जन स्वार्थरत, साधें सब निज काम ।
प्रेमी अन्यों के लिये, त्यागें हड्डी-चाम ॥
73
सिद्ध हुआ प्रिय जीव का, जो तन से संयोग ।
मिलन-यत्न-फल प्रेम से, कहते हैं बुध लोग ॥
74
मिलनसार के भाव को, जनन करेगा प्रेम ।
वह मैत्री को जन्म दे, जो है उत्तम क्षेम ॥
75
इहलौकिक सुख भोगते, निश्रेयस का योग ।
प्रेमपूर्ण गार्हस्थ्य का, फल मानें बुध लोग ॥
76
साथी केवल धर्म का, मानें प्रेम, अजान ।
त्राण करे वह प्रेम ही, अधर्म से भी जान ॥
77
कीड़े अस्थिविहीन को, झुलसेगा ज्यों धर्म ।
प्राणी प्रेम विहीन को, भस्म करेगा धर्म ॥
78
नीरस तरु मरु भूमि पर, क्या हो किसलय-युक्त ।
गृही जीव वैसा समझ, प्रेम-रहित मन-युक्त ॥
79
प्रेम देह में यदि नहीं, बन भातर का अंग ।
क्या फल हो यदि पास हों, सब बाहर के अंग ॥
80
प्रेम-मार्ग पर जो चले, देह वही सप्राण ।
चर्म-लपेटी अस्थि है, प्रेम-हीन की मान ॥
अध्याय 9. अतिथि-सत्कार
81
योग-क्षेम निबाह कर, चला रहा घर-बार ।
आदर करके अतिथि का, करने को उपकार ॥
82
बाहर ठहरा अतिथि को, अन्दर बैठे आप ।
देवामृत का क्यों न हो, भोजन करना पाप ॥
83
दिन दिन आये अतिथि का, करता जो सत्कार ।
वह जीवन दारिद्रय का, बनता नहीं शिकार ॥
84
मुख प्रसन्न हो जो करे, योग्य अतिथि-सत्कार ।
उसके घर में इन्दिरा, करती सदा बहार ॥
85
खिला पिला कर अतिथि को, अन्नशेष जो खाय ।
ऐसों के भी खेत को, काहे बोया जाया ॥
86
प्राप्त अतिथि को पूज कर, और अतिथि को देख ।
जो रहता, वह स्वर्ग का, अतिथि बनेगा नेक ॥
87
अतिथि-यज्ञ के सुफल की, महिमा का नहिं मान ।
जितना अतिथि महान है, उतना ही वह मान ॥
88
'कठिन यत्न से जो जुड़ा, सब धन हुआ समाप्त' ।
यों रोवें, जिनको नहीं, अतिथि-यज्ञ-फल प्राप्त ॥
89
निर्धनता संपत्ति में, अतिथि-उपेक्षा जान ।
मूर्ख जनों में मूर्ख यह, पायी जाती बान ॥
90
सूंघा ‘अनिच्च’ पुष्प को, तो वह मुरझा जाय ।
मुँह फुला कर ताकते, सूख अतिथि-मुख जाय ॥
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