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prasanna
Age: 49 Zodiac: 
| Joined: 20 Feb 2008 |
| Posts: 4397 |
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Location: DUBAI, Los Angeles, Chennai
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Posted: Fri May 16, 2008 6:24 am |
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अध्याय 6. सहधर्मिणी
51
गृहिणी-गुण-गण प्राप्त कर, पुरुष-आय अनुसार ।
जो गृह-व्यय करती वही, सहधर्मिणी सुचार ॥
52
गुण-गण गृहणी में न हो, गृह्य-कर्म के अर्थ ।
सुसंपन्न तो क्यों न हो, गृह-जीवन है व्यर्थ ॥
53
गृहिणी रही सुधर्मिणी, तो क्या रहा अभाव ।
गृहिणी नहीं सुधर्मिणी, किसका नहीं अभाव ॥
54
स्त्री से बढ़ कर श्रेष्ठ ही, क्या है पाने योग्य ।
यदि हो पातिव्रत्य की, दृढ़ता उसमें योग्य ॥
55
पूजे सती न देव को, पूज जगे निज कंत ।
उसके कहने पर ‘बरस’, बरसे मेघ तुरंत ॥
56
रक्षा करे सतीत्व की, पोषण करती कांत ।
गृह का यश भी जो रखे, स्त्री है वह अश्रांत ॥
57
परकोटा पहरा दिया, इनसे क्या हो रक्ष ।
स्त्री हित पातिव्रत्य ही, होगा उत्तम रक्ष ॥
58
यदि पाती है नारियाँ, पति पूजा कर शान ।
तो उनका सुरधाम में, होता है बहुमान ॥
59
जिसकी पत्नी को नहीं, घर के यश का मान ।
नहिं निन्दक के सामने, गति शार्दूल समान ॥
60
गृह का जयमंगल कहें, गृहिणी की गुण-खान ।
उनका सद्भूषण कहें, पाना सत्सन्तान ॥
अध्याय 7. संतान-लाभ
61
बुद्धिमान सन्तान से, बढ़ कर विभव सुयोग्य ।
हम तो मानेंगे नहीं, हैं पाने के योग्य ॥
62
सात जन्म तक भी उसे, छू नहिं सकता ताप ।
यदि पावे संतान जो, शीलवान निष्पाप ॥
63
निज संतान-सुकर्म से, स्वयं धन्य हों जान ।
अपना अर्थ सुधी कहें, है अपनी संतान ॥
64
नन्हे निज संतान के, हाथ विलोड़ा भात ।
देवों के भी अमृत का, स्वाद करेगा मात ॥
65
निज शिशु अंग-स्पर्श से, तन को है सुख-लाभ ।
टूटी- फूटी बात से, श्रुति को है सुख-लाभ ॥
66
मुरली-नाद मधुर कहें, सुमधुर वीणा-गान ।
तुतलाना संतान का, जो न सुना निज कान ॥
67
पिता करे उपकार यह, जिससे निज संतान ।
पंडित-सभा-समाज में, पावे अग्रस्थान ॥
68
विद्यार्जन संतान का, अपने को दे तोष ।
उससे बढ़ सब जगत को, देगा वह संतोष ॥
69
पुत्र जनन पर जो हुआ, उससे बढ़ आनन्द ।
माँ को हो जब वह सुने, महापुरुष निज नन्द ॥
70
पुत्र पिता का यह करे, बदले में उपकार ।
`धन्य धन्य इसके पिता’, यही कहे संसार ॥
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